Wednesday, April 12, 2017

हम क्रांति के गीत गाते चलें



राष्ट्र की चेतना को जगाते चलें
हम क्रांति के गीत गाते चलें...

अंधेरे को टिकने न दें हम यहाँ,
नयी रोशनी हम जलाते चलें ।
निराशा न हो अब कहीं देश में,
आशा का सूरज उगाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...


जागे धरा और गगन भी जगे,
दिशा जाग जाए पवन भी जगे ।
नया तान छेड़े अब पंछी यहाँ,
नव क्रांति के स्वर उठाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...


अशिक्षित रहे न कोई देश में,
पराश्रित रहे न कोई देश में ।
समृद्धि दिखे अब हर क्षेत्र में,
स्वावलम्बी, सशक्त राष्ट्र बनाते चलें।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........


प्रदूषण हटाएंं पर्यावरण संवारें,
पुनः राष्ट्रभूमि में हरितिमा उगायें ।
सभ्य, सुशिक्षित बने देशवासी,
गरीबी ,उदासी मिटाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........


जगे नारियाँ शक्ति का बोध हो,
हो प्रगति, न कोई अवरोध हो ।
अब देश की अस्मिता जाए ,
शक्ति के गुण गुनगनाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...........


युवा देश के आज संकल्प लें ,
नव निर्माण फिर से सृजन का करें
मानवी वेदना को मिटाते हुए,
धरा स्वर्ग सी अब बनाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........

Wednesday, April 5, 2017

शुक्रिया प्रभु का.......






हम चलें एक कदम
फिर कदम दर कदम
यूँ कदम से कदम हम
फिर बढाते चले.......
जिन्दगी राह सी,और
चलना गर मंजिल.....
नयी उम्मीद मन में जगाते रहें.......
खुशियाँ मिले या गम
हम चले,हर कदम
शुकराने तेरे (प्रभु के) मन में गाते रहें......


डर भी है लाजिमी, इन राहों पर,
कहीं खाई है, तो कभी तूफान हैं......
कभी राही मिले जाने-अनजाने से,
कहीं राहें बहुत ही सुनसान हैं........
आशा उम्मीद के संग हो थोड़ा सब्र
साहस देना तो उसकी पहचान है......
मन मेंं हर पल करे जो
शुकराना तेरा(प्रभु का)....
मंजिलें पास लाना तेरा काम है.....
ये दुनिया तेरी, जिन्दगानी तेरी,
बस यूँ जीना सिखाना तेरा काम है.....


कभी चिलमिलाती उमस का कहर,
कभी शीत जीवन सिकुडाती सी है.....
कभी रात काली अमावश बनी,
कभी चाँद पूनम दे जाती जो है....
न हो कोई शिकवा ,न कोई गिला
बस तेरे गुण ही यूँ गुनगुनाते रहें,
जीवन दर्शन जो दिया तूने,
शुकराने तेरे मन में गाते रहें........
नयी उम्मीद मन में जगाते रहें....

Tuesday, March 28, 2017

उफ! "गर्मी आ गयी"

     



बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी,
तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली .....
               "लो मैंं आ गई"

औऱ फिर सब एक साथ बोल उठे....
           उफ !गर्मी आ गई ?

हाँ !  मैं आ गयी......अब क्या हुआ?
सखी सर्दी  जब थी यहाँ आई,
तब भी तुम कहाँ खुश थे ?
रोज स्मरण कर मुझे
कोसे थे सर्दी को तुम........
ताने -बाने सर्दी सुनकर
चुप लौटी बेचारी बनकर।
उसे मिटाने और निबटाने,
क्या-क्या नहीं करे थे तुम........
पेड़ भी सारे काट गिराये,
बस तब तुमको धूप ही भाये ?
छाँव कहीं पर रह ना जाए,
राहों के भी वृक्ष कटाये.......
जगह-जगह अलाव जलाकर,
फिर सर्दी को तुम निबटाये.......
गयी बेचारी अपमानित सी होकर,
बसंत आ गया फिर मुँह धोकर
दो दिन की मेहमानवाजी
फिर तुम सबको भा गयी
पर अब  लो "मैं आ गयी"......
करो जतन मुझसे निबटो तुम,
मैं हर घर -आँगन में छा गयी....
      "लो मैं आ गयी"
-सुधा देवरानी






Tuesday, March 21, 2017

जब से मिले हो तुम


जीवन  बदला ,दुनिया बदली,
मन को अनोखा,ज्ञान मिला।
मिलकर तुमसे मुझको मुझमें
 एक नया इंसान मिला।

रोके भी नहीं रुकती थी जो,
आज चलाए चलती हूँ।
जो तुम चाहते वही हूँ करती
जैसे कोई कठपुतली हूँ

माथे की तुम्हारी एक शिकन,
मन ऐसा झकझोरे क्यों...
होंठों की तुम्हारी एक हँसी
मानूँ जीवन की बडी खुशी

गलती भी तुम्हारी सिर्फ़ शरारत,
दुख अपना गर तुम्हें मुसीबत ।
दुनिया अपनी उजड सी जाती,
आँखों में दिखे गर थोड़ी नफरत ।

बेवशी सी कैसी छायी मुझमें
क्यों हर सुख-दुख देखूँ तुममें.....

कब चाहा ऐसे बन जाऊँँ,
जजबाती फिर कहलाऊँ।
प्रेम-दीवानी सी बनकर......
फिर विरह-व्यथा में पछताऊँ ।

Wednesday, March 8, 2017

दो दिन की हमदर्दी में, जीवन किसका निभ पाया....


जाने इनके जीवन में ,
ये कैसा मोड आया,
खुशियाँँ कोसों दूर गयी
दुख का सागर गहराया...
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया.....

आयी है बसंत मौसम में,
हरियाली है हर मन में,
पतझड़ है तो बस इनके,
इस सूने से जीवन में.......
इस सूने जीवन में तो क्या,
खुशियाँ आना मुमकिन है ?
आँसू अविरल बहते इनके ,
मन मेरा ऐसे घबराया......

छिन गया बचपन बच्चों का,
उठ गया सर से जब साया,
हो गये अनाथ जो इक पल में
नहीं रहा पिता का इन्हे सहारा.....
मुश्किल जीवन बीहड राहें,
उस पर मासूम अकेले से,
कैसे आगे बढ पायेंगे,
मेरा मन सोचे घबराया.....

बूढे माँ-बाप आँखें फैलाकर,
जिसकी राह निहारा करते थे।
उसे "शहीद "कह विदा कर रहे,
स्वयं विदा जिससे लेने वाले थे...
इन बूढी आँखों के बहते जो,
आँसू कौन पोंछने आयेगा.......
"गर्व करे शहीदों पर"पूरा देश।
घरवालों को कौन संभालेगा.....
दो दिन की हमदर्दी में,
जीवन किसका निभ पाया....
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया...

जाने इनके जीवन में,
एक ऐसा ही मोड़ आया
खुशियाँ कोसों दूर गयी...
दुख का सागर गहराया ।।

Saturday, February 25, 2017

"पुष्प और भ्रमर"





तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।

हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे...।.
बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा
तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई......
ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा ।

न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी.......
मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा
तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा....
और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा

तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी.....
मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।

           "मगर अफसोस" !!!

तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी......
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ?
मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ.....                      
ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा ।

मौसम में जब भी समाँ लौट आये.....
मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा .........


*कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा*
   

                                                      ...सुधा देवरानी*







                                                   

             




Sunday, February 12, 2017

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;



जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे,
कलई / पालिस कर चमका दिये गये
नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम...
ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है।
खोखले थे सो टूटना ही था,
दोष लाने वालों पर मढ दिये गये...
शुभ और अशुभ भी हो गयी घडियाँ....
मनहूसियत को बहुओं के सर मढते देखा है।
हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है।

झगड़ते थे बचपन मे भी,
खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के....
क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा,
हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का....
उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है।

वो बचपन था अब बडे हुए,
तब प्यार था अब नफरत है.....
छीनने के लिए खिलौने थे,
औऱ अब पैतृक सम्पत्ति.....
तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे,
अब वकील औऱ न्यायाधीश....
भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ;
या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

हो गयी जीत मिल गये हिस्से,
खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से...
जश्न मनाते सारे चमचे,
नाचते-गाते नये-नये रिश्ते...
अंधियारे -सूने कोने में छुप उसको सुबकते देखा है ;
या यूँ कह दे-"प्रेम के आगे दंभ को झुकते देखा है",
हाँ!मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

पर क्या फायदा ? पहल करेगा कौन,
जब बडा बडा ही बनकर बैठा,
छोटा भी छुटपन में ऐंठा.....
पडौसी रिश्ते तमाशबीन हुए,
माँ-बाप परलोक जो गये.......
कौन सुलह करवाए इनकी,
झूठी शान खोखला अभिमान...
अक्ल पर भी तो जाने कब से बडा सा पत्थर फेरा है ;
ऐसे में भी कभी किसी ने रिश्तों को निभते देखा है ?
हाँ !मैने ऐसे ही रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।
                                                         
                                           ....सुधा देवरानी