Tuesday, March 28, 2017

उफ! "गर्मी आ गयी"

     



बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी,
तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली .....
               "लो मैंं आ गई"

औऱ फिर सब एक साथ बोल उठे....
           उफ !गर्मी आ गई ?

हाँ !  मैं आ गयी......अब क्या हुआ?
सखी सर्दी  जब थी यहाँ आई,
तब भी तुम कहाँ खुश थे ?
रोज स्मरण कर मुझे
कोसे थे सर्दी को तुम........
ताने -बाने सर्दी सुनकर
चुप लौटी बेचारी बनकर।
उसे मिटाने और निबटाने,
क्या-क्या नहीं करे थे तुम........
पेड़ भी सारे काट गिराये,
बस तब तुमको धूप ही भाये ?
छाँव कहीं पर रह ना जाए,
राहों के भी वृक्ष कटाये.......
जगह-जगह अलाव जलाकर,
फिर सर्दी को तुम निबटाये.......
गयी बेचारी अपमानित सी होकर,
बसंत आ गया फिर मुँह धोकर
दो दिन की मेहमानवाजी
फिर तुम सबको भा गयी
पर अब  लो "मैं आ गयी"......
करो जतन मुझसे निबटो तुम,
मैं हर घर -आँगन में छा गयी....
      "लो मैं आ गयी"
-सुधा देवरानी






Post a Comment