सोमवार, 13 नवंबर 2017

मन इतना उद्वेलित क्यों.........





मानव मन इतना उद्वेलित क्यों ?
अस्थिर, क्रोधित, विचलित बन,
 हद से ज्यादा उत्तेजित क्यों ?

अटल क्यों नहीं ये पर्वत सा,
नहीं आसमां सा सहनशील......
स्वार्थ समेटे है बोझिल मन !
नहीं नदियों सा इसमें निस्वार्थ गमन.....

मात्र मानव को दी प्रभु ने बुद्धिमत्ता !
बुद्धि से मिली वैचारिक क्षमता....
इससे पनपी वैचारिक भिन्नता !
वैचारिक भिन्नता से टकराव.....
टकराव से शुरू समस्याएं ?
उलझी फिर "मन" से मानवता !

होता है वक्त और कारण 
समुद्री ज्वार भाटे का....
पर मन के ज्वार भाटे का,
नहीं कोई वक्त नहीं कारण !!
उद्वेलित मन ढूँढे अब इसका निवारण !!!

शान्ति भंग कर देता सबकी,
पहले खुद की,फिर औरों की.....
विकट समस्या बन जाता है,
विचलित जब हो जाता मन.....

बाबाओं की शरण न जाकर,
कुछ बातों का ध्यान गर रख पायें......!
तुलनात्मक प्रवृति से उबरें,
"संतुष्टि, धैर्य" भी अपनायें....

योगासनों का सहारा लेकर,
मानसिक ,चारित्रिक और आध्यात्मिक
मजबूती ,निज मन को देकर....
"ज्ञान और आत्मज्ञान" बढायें........
मन-मस्तिष्क की अतुलनीय शक्ति से
पुनः सर्व-शक्तिमान बन जायें.....
 
                                  चित्र : साभार गूगल से -

बुधवार, 8 नवंबर 2017

आरक्षण और बेरोजगारी.........



 
 चित्र : "साभार गूगल से"


जब निकले थे घर से ,अथक परिश्रम करने,
 नाम रौशन कर जायेंगे,ऐसे थे अपने सपने.......
   ऊँची थी आकांक्षाएं , कमी न थी उद्यम में,
      बुलंद थे हौसले भी तब ,जोश भी था तब मन में !!
        नहीं डरते थे बाधाओं से, चाहे तूफ़ान हो राहों में !
           सुनामी की लहरों को भी,हम भर सकते थे बाहों में


शिक्षित बन डिग्री लेकर ही, हम आगे बढ़ते जायेंगे।
   सुशिक्षित भारत के सपने को, पूरा करके दिखलायेंगे ।।
     महंगी जब लगी पढ़ाई, हमने मजदूरी भी की ।
        काम दिन-भर करते थे,  रात पढ़ने में गुजरी।।
           शिक्षा पूरी करके हम ,  बन गये डिग्रीधारी।
              फूटी किस्मत के थे हम ,झेलें अब बेरोजगारी ।।


शायद अब चेहरे से ही , हम पढ़े-लिखे दिखते हैं !
  तभी तो हमको मालिक , काम देने में झिझकते हैं .....
     कहते ; "दिखते हो पढ़े-लिखे, कोई अच्छा सा काम करो !
                ऊँचे पद को सम्भालो,देश का ऊँचा नाम करो" !!!

  कैसे उनको समझाएं? हम सामान्य जाति के ठहरे,....
  देश के सारे पदोंं पर तो अब,  हैं आरक्षण के पहरे.!!!


सोचा सरकार बदल जायेगी, अच्छे दिन अपने आयेंगे !
     "आरक्षण और जातिवाद" से,  सब छुटकारा पायेंगे ।
         सत्ता बदली नेता बदले, ना बदले  दिन अपने !
              जोश होश भी गया भाड़ में ,जब टूटे सारे सपने !


उजड़ा सा है जीवन, बिखरे से हैं सपने,
     टूटी सी उम्मीदें ,  रूठे से हैं अपने.....
        कोरी सी कल्पनाएं,धुंधली आकांक्षाएं...
             मन के किस कोने में, आशा का दीप जलाएं ???

   "हम मन के कोने में, कैसे आशा का दीप जलाएं"...???
               
                       

बुधवार, 1 नवंबर 2017

इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?.......

चित्र :  साभार, गूगल से-


जब जान लिया पहचान लिया,
नहीं वो तेरा यह मान लिया ।
बेरुखी उसकी स्वीकार तुझे,
फिर घुट-घुट जीवन जीना क्या ?
हर पल उसकी ही यादों में,
गमगीन तेरा यूँ रहना क्या ?......
तेरा छुप-छुप आँँसू पीना क्या ?


उसके आते ही तेरी नजर,
बस उसमें थम जाती है ।
धड़कन भी बढ़ जाती है,
आँखों में चमक आ जाती है।
तू साथ चाहता क्यों उसका,
वो तुझसे कोसों दूर खड़ा ?........
जब उसको ये मंजूर नहीं,
इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?


उसकी राहें भी तुझसे जुदा,
मंजिल उसकी कहीं और ही है,
नहीं हो सकता तेरा उसका मिलन,
दिल में उसके कुछ और ही है।
वो चाँद आसमां का ठहरा,
चकोर सा तेरा तड़पना क्या ?.......
फिर मन ही मन यूँ जलना क्या,
इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?

जीवन तेरा भी अनमोल यहाँ,
तेरे चाहने वाले और भी हैं।
इकतरफा सोच से निकल जरा,
तेरे दुख से दुखी तेरे और भी हैं।
वीरान पड़ी राहों में तेरा...
यूँ फिर-फिर आगे बढ़ना क्या ?.....
इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?
फिर मन ही मन यूँ जलना क्या......??


मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

🕯मन- मंदिर को रौशन बनाएंं🕯





   मन - मंदिर को रौशन बनाएंं
चलो ! एक दिया आज मन मेंं जलाएं,
अबकी दिवाली कुछ अलग हम मनाएंं ।
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं.....

मन का एक कोना निपट है अंधेरा,
जिस कोने को "अज्ञानता" ने घेरा ।
अज्ञानता के तम को दूर अब भगाएं
 ज्ञान का एक दीप मन में जलाएं,
    मन -मंदिर को रौशन बनाएं  ।
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं......

काम, क्रोध, लोभ, मोह मन को हैं घेरे ,
जग उजियारा है पर, मन हैं अंधेरे ....
रात नजर आती है भरी दोपहरी में ,
रौशन दिवाली कब है, मन की अंधेरी में ।
  प्रेम का एक दीप मन में जलाएं,
     मन -मंदिर को रौशन बनाएं ।
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं.......

निराशा न हो मन में, हिम्मत न हार जाएं,
चाहे कठिन हो राहेंं, कदम न डगमगाएं
ईर्ष्या न हो किसी से,लालच करें नहीं हम,
परिश्रम की राह चलकर सन्तुष्टि सभी पाएं
  आशा का एक दीप मन में जलाएं
       मन-मंदिर को रौशन बनाएं
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं  ।।

भय, कुण्ठा संदेह भी ,मन को हैं घेरे
दुख के बादल छाये ,चहुँओर घनेरे ।
खुशी का एक दीप मन में जलाएंं
    मन मंदिर को रौशन बनाएं
चलो !एक दिया आज मन में जलाएं ।।
अबकी दिवाली मन को रौशन बनाएं.....

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

आराम चाहिए......


                             
                                                                       
आज हर किसी को आराम चाहिए
 न हो हाथ मैले,न हो पैर मैले....
ऐसा अब कोई काम चाहिए....
बिन हिले-डुले कुछ नया कर दिखायेंं !!
हाँ ! सुर्खियों में अपना अब नाम चाहिए
आज हर किसी को आराम चाहिए.....

मुश्किलें तो नजर आती हैं सबको बड़ी-बड़ी,
स्वयं कुछ कर सकें, ऐसी हिम्मत नहीं पड़ी ।
सब ठीक करने वाला, अवतारी आये धरा पर,
नरतनधारी कोई "श्रीकृष्ण या श्रीराम" चाहिए !!
आज हर किसी को आराम चाहिए.........

बच्चों को दिखाते हैं, ये अन्तरिक्ष के सपने !
जमीं में नजर आये न इनको कोई अपने
जमींं में रखा क्या, मिट्टी से है घृणा .....
पर घर में भरे अन्न के गोदाम चाहिए !!
आज हर किसी को आराम चाहिए.........

माँ-बाप मुसीबत लग रहे हैंं इनको आज ,
कटी पतंग सा उड़ रहा है अब समाज ।
दो शब्द बड़ों के चुभते है शूल से !
मेहनत करें भी कैसे,नाजुक हैं फूल से....?
आज को यूँ ही गवां रहे तो क्या....?
"कल मिलेगी हर खुशी" ये इन्तजाम चाहिए !!
आज हर किसी को आराम चाहिए........

                         चित्र-साभार गूगल से...










सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी.......






सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
रो-रो कर सहती प्रताड़ना को
नियति मानती थी....
जैसे कीलों के आसन पर ,
कोई कुत्ता पल पल रोता....
जब चुभती कीलें उठ जाता
फिर थककर सोता......
फिर बैठ वहीं, दुखकर
बस थोड़ा उठ जाता....
पर कभी ना कोशिश करता
आसन से बाहर आने की ,
अपने भारत की भी कुछ,ऐसे ही कहानी थी...
तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी.....
गर रोष में आकर कोई 
आवाज उठा देता......
दुश्मन से फिर अपना
सर्वस्व लुटा देता......
इस डर से चुप सहना ही सबने ठानी थी....
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
बड़ी कोशिश से बापू ने
सोयों को जगाया था........
आजादी का सपना 
फिर सबको दिखाया था.......
अंग्रेज चले जायेंं ,
फिर देश सम्भालेंगे.........
घर के लफड़े जो हैं ,
हम मिलकर निबटा लेंगे.......
मन में भावना ऐसी, बापू ने ठानी थी....
जब सोयी थी जनता, स्वीकार गुलामी थी....
दुश्मन तो हार गया !
अपनो ने हरा डाला....
आजाद किया जिस देश को
टुकड़े में बदल डाला.......
विरोधी तत्वों की मिली भगत पुरानी थी......
तब सोयी थी जनता स्वीकार गुलामी थी.....
भला किया जिनका....
अपमान मिला उनसे
सीधे सच्चे बापू...
धोखे मिले अपनो से.......
अब भी ना जाने क्या जनता ने ठानी थी.....
तब सोयी थी जनता स्वीकार गुलामी थी....
काफी था बापू जो
कर चुके थे तब तक तो
सरकार ने सत्ता में सियासत जो निभानी थी...
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी....
जो होना था सो हो गया,
बापू के हिस्से दोष गया....
आजादी के बदले में बदनामी
अहिंसा के बदले में, हत्या.....
बचा-खुचा जो मान है जनता आज  मिटाती है
जन्म-दिवस पर उनकी जयन्ती ऐसे मनाती है ?..
आलोचक उनकी करनी में
पानी फेरे जाते हैं.......
जो खुद कुछ कर न सके
बापू को मिटाते हैं.......
इतिहास बन गये जो ,उनको इतिहास ही रहने दो......
परकर्मों को कहते कहते,निज कर्म ही मत भूलो.....
"आज"तो तुम हो देश के, तुम ही कुछ आज करो....



सोमवार, 18 सितंबर 2017

चुप सो जा....मेरे मन ....चुप सो जा....!!!

   

       रात छाई है घनी ......
   पर कल सुबह होनी नयी,
   कर बन्द आँखें , सब्र रख तू ;
    मत रो ,मुझे न यूँ सता.......
*चुप सो जा........मेरे मन.......चुप सो जा*.....!!!
     तब तक तू चुप सोया रह !
     जब तक न हो जाये सुबह ;
   नींद में सपनों की दुनिया तू सजा .........
*चुप सो जा.........मेरे मन......चुप सो जा*.......!!!
      सोना जरुरी है, नयी शुरुआत करनी है ,
      भूलकर सारी मुसीबत, आस भरनी है ;
   जिन्दगी के खेल फिर-फिर खेलने तू जा.....
*चुप सो जा......मेरे मन........चुप सो जा*............!!!
     सोकर जगेगा, तब नया सा प्राण पायेगा ,
    जो खो दियाअब तक, उसे भी भूल जायेगा ;
   पाकर नया कुछ, फिर पुराना तू यहाँ खो जा.......
*चुप सो जा ..........मेरे मन.........चुप सो जा*.........!!!
    दस्तूर हैं दुनिया के कुछ, तू भी सीख ले ;
     है सुरमई सुबह यहाँ,  तो साँझ भी ढ़ले ,
    चिलमिलाती धूप है, तो स्याह सी है रात भी....
     है तपिश जब दुपहरी,तो छाँव की सौगात भी...
     दुःख नरक से लग रहे तो, स्वर्ग भी है जिन्दगी ;
     चाह सुख की है तुझे तो ,कर ले तू भी बन्दगी....!
       पलकों में उम्मीदों के सपने तू सजा...... ...!
चुप सो जा.......मेरे मन...........चुप सो जा...........!!!
                                                               
                                            चित्र- "साभार गूगल  से"