शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

नारी : अतीत से वर्तमान तक





कुछ करने की चाह लिए
अस्तित्व की परवाह लिए 
मन ही मन सोचा करती थी
बाहर दुनिया से डरती थी......

भावों में समन्दर सी गहराई
हौसले की उड़ान भी थी ऊँची 
वह कैद चहारदीवारी में भी,
सपनों की मंजिल चुनती थी....

जग क्या इसका आधार है क्या ?
धरा आसमां के पार है क्या,?
अंतरिक्ष छानेगी वह इक दिन
ख्वाबों में उड़ाने भरती थी.....

हिम्मत कर निकली जब बाहर,
देहलीज लाँघकर आँगन तक ।
आँगन खुशबू से महक उठा,
फूलों की बगिया सजती थी........

अधिकार जरा सा मिलते ही,
वह अंतरिक्ष तक हो आयी...
जल में,थल में,रण कौशल में
सक्षमता अपनी  दिखलायी.......

बल, विद्या, हो या अन्य क्षेत्र
इसने परचम अपना फहराया
सबला,सक्षम हूँ, अब तो मानो
अबला कहलाना कब भाया........

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जब सृष्टि सृजन की थी शुरूआत
सोच - विचार के बनी थी बात.......
क्योंकि.......

दिल से दूर पुरुष था तब,
नाकाबिल, अक्षम, अनायास...
सृष्टि सृजन , गृहस्थ जीवन
हेतु किया था सफल प्रयास.....

पुरूषार्थ जगाने, प्रेम उपजाने,
सक्षमता  का आभास कराने ।
कोमलांगी नाजुक गृहणी बनकर,
वृषभकन्धर पर डाला था भार.........

अभिनय था तब अबला होने का
शक्ति हीन कब थी दुर्गा ?......
भ्रम रहा युग-युग से महिषासुर को
रणचण्डी को हराने का.......!!!!!


                                    चित्र: साभार, गूगल से


रविवार, 26 नवंबर 2017

प्रेम

   




              प्रेम
  अपरिभाषित एहसास।
  " स्व" की तिलांजली...
       "मै" से मुक्ति !
   सर्वस्व समर्पण भाव
   निस्वार्थ,निश्छल
       तो प्रेम क्या ?
     बन्धन या मुक्ति  !
 प्रेम तो बस, शाश्वत भाव
    एक सुखद एहसास!!
            एहसास?
    हाँ !  पर  होता है......
       दिल का दिल से
    आत्मिक /अलौकिक
       कहीं भी, कभी भी....
  बिन सोचे,  बिन समझे
 एक अनुभूति , अलग सी
            बहुत दूर.....
    दिल के  बहुत  पास,
 टीस बनकर चुभ जाती है,
औऱ उस दर्द में आनन्द आता है,
       असीम आनन्द !!!
      और   चुभन   ?
 आँसू  बनकर बहते आँखों से
          बस फिर
        खो जाता मन
   उसी प्रेम में आजीवन
         और फिर
  प्रेम के पार, प्रेमी का संसार
        आत्मिक मिलन
  नहीं कोई सांसारिक बंधन
        बंद आँखों में
  पावन सा अपना मिलन
    अनोखा,अजीब सा,
  मनभावन, वह आलिंगन 
    जिसके साक्ष्य बनते
      सुदूर आसमां में
    सूरज ,चाँद ,सितारे 
         क्षितिज पर
  प्रेममय : धरा - आसमाँ
        आसीस देते ......
अनुपम सौन्दर्य से प्रकृति करती
         प्रेम का प्रेम से
          अभिनन्दन.........।।


            चित्र : गूगल से साभार

सोमवार, 13 नवंबर 2017

मन इतना उद्वेलित क्यों.........





मानव मन इतना उद्वेलित क्यों ?
अस्थिर, क्रोधित, विचलित बन,
 हद से ज्यादा उत्तेजित क्यों ?

अटल क्यों नहीं ये पर्वत सा,
नहीं आसमां सा सहनशील......
स्वार्थ समेटे है बोझिल मन !
नहीं नदियों सा इसमें निस्वार्थ गमन.....

मात्र मानव को दी प्रभु ने बुद्धिमत्ता !
बुद्धि से मिली वैचारिक क्षमता....
इससे पनपी वैचारिक भिन्नता !
वैचारिक भिन्नता से टकराव.....
टकराव से शुरू समस्याएं ?
उलझी फिर "मन" से मानवता !

होता है वक्त और कारण 
समुद्री ज्वार भाटे का....
पर मन के ज्वार भाटे का,
नहीं कोई वक्त नहीं कारण !!
उद्वेलित मन ढूँढे अब इसका निवारण !!!

शान्ति भंग कर देता सबकी,
पहले खुद की,फिर औरों की.....
विकट समस्या बन जाता है,
विचलित जब हो जाता मन.....

बाबाओं की शरण न जाकर,
कुछ बातों का ध्यान गर रख पायें......!
तुलनात्मक प्रवृति से उबरें,
"संतुष्टि, धैर्य" भी अपनायें....

योगासनों का सहारा लेकर,
मानसिक ,चारित्रिक और आध्यात्मिक
मजबूती ,निज मन को देकर....
"ज्ञान और आत्मज्ञान" बढायें........
मन-मस्तिष्क की अतुलनीय शक्ति से
पुनः सर्व-शक्तिमान बन जायें.....
 
                                  चित्र : साभार गूगल से -

बुधवार, 8 नवंबर 2017

आरक्षण और बेरोजगारी.........



 
 चित्र : "साभार गूगल से"


जब निकले थे घर से ,अथक परिश्रम करने,
 नाम रौशन कर जायेंगे,ऐसे थे अपने सपने.......
   ऊँची थी आकांक्षाएं , कमी न थी उद्यम में,
      बुलंद थे हौसले भी तब ,जोश भी था तब मन में !!
        नहीं डरते थे बाधाओं से, चाहे तूफ़ान हो राहों में !
           सुनामी की लहरों को भी,हम भर सकते थे बाहों में


शिक्षित बन डिग्री लेकर ही, हम आगे बढ़ते जायेंगे।
   सुशिक्षित भारत के सपने को, पूरा करके दिखलायेंगे ।।
     महंगी जब लगी पढ़ाई, हमने मजदूरी भी की ।
        काम दिन-भर करते थे,  रात पढ़ने में गुजरी।।
           शिक्षा पूरी करके हम ,  बन गये डिग्रीधारी।
              फूटी किस्मत के थे हम ,झेलें अब बेरोजगारी ।।


शायद अब चेहरे से ही , हम पढ़े-लिखे दिखते हैं !
  तभी तो हमको मालिक , काम देने में झिझकते हैं .....
     कहते ; "दिखते हो पढ़े-लिखे, कोई अच्छा सा काम करो !
                ऊँचे पद को सम्भालो,देश का ऊँचा नाम करो" !!!

  कैसे उनको समझाएं? हम सामान्य जाति के ठहरे,....
  देश के सारे पदोंं पर तो अब,  हैं आरक्षण के पहरे.!!!


सोचा सरकार बदल जायेगी, अच्छे दिन अपने आयेंगे !
     "आरक्षण और जातिवाद" से,  सब छुटकारा पायेंगे ।
         सत्ता बदली नेता बदले, ना बदले  दिन अपने !
              जोश होश भी गया भाड़ में ,जब टूटे सारे सपने !


उजड़ा सा है जीवन, बिखरे से हैं सपने,
     टूटी सी उम्मीदें ,  रूठे से हैं अपने.....
        कोरी सी कल्पनाएं,धुंधली आकांक्षाएं...
             मन के किस कोने में, आशा का दीप जलाएं ???

   "हम मन के कोने में, कैसे आशा का दीप जलाएं"...???
               
                       

बुधवार, 1 नवंबर 2017

इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?.......

चित्र :  साभार, गूगल से-


जब जान लिया पहचान लिया,
नहीं वो तेरा यह मान लिया ।
बेरुखी उसकी स्वीकार तुझे,
फिर घुट-घुट जीवन जीना क्या ?
हर पल उसकी ही यादों में,
गमगीन तेरा यूँ रहना क्या ?......
तेरा छुप-छुप आँँसू पीना क्या ?


उसके आते ही तेरी नजर,
बस उसमें थम जाती है ।
धड़कन भी बढ़ जाती है,
आँखों में चमक आ जाती है।
तू साथ चाहता क्यों उसका,
वो तुझसे कोसों दूर खड़ा ?........
जब उसको ये मंजूर नहीं,
इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?


उसकी राहें भी तुझसे जुदा,
मंजिल उसकी कहीं और ही है,
नहीं हो सकता तेरा उसका मिलन,
दिल में उसके कुछ और ही है।
वो चाँद आसमां का ठहरा,
चकोर सा तेरा तड़पना क्या ?.......
फिर मन ही मन यूँ जलना क्या,
इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?

जीवन तेरा भी अनमोल यहाँ,
तेरे चाहने वाले और भी हैं।
इकतरफा सोच से निकल जरा,
तेरे दुख से दुखी तेरे और भी हैं।
वीरान पड़ी राहों में तेरा...
यूँ फिर-फिर आगे बढ़ना क्या ?.....
इकतरफा प्रेम यूँ करना क्या ?
फिर मन ही मन यूँ जलना क्या......??


मंगलवार, 17 अक्तूबर 2017

🕯मन- मंदिर को रौशन बनाएंं🕯





   मन - मंदिर को रौशन बनाएंं
चलो ! एक दिया आज मन मेंं जलाएं,
अबकी दिवाली कुछ अलग हम मनाएंं ।
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं.....

मन का एक कोना निपट है अंधेरा,
जिस कोने को "अज्ञानता" ने घेरा ।
अज्ञानता के तम को दूर अब भगाएं
 ज्ञान का एक दीप मन में जलाएं,
    मन -मंदिर को रौशन बनाएं  ।
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं......

काम, क्रोध, लोभ, मोह मन को हैं घेरे ,
जग उजियारा है पर, मन हैं अंधेरे ....
रात नजर आती है भरी दोपहरी में ,
रौशन दिवाली कब है, मन की अंधेरी में ।
  प्रेम का एक दीप मन में जलाएं,
     मन -मंदिर को रौशन बनाएं ।
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं.......

निराशा न हो मन में, हिम्मत न हार जाएं,
चाहे कठिन हो राहेंं, कदम न डगमगाएं
ईर्ष्या न हो किसी से,लालच करें नहीं हम,
परिश्रम की राह चलकर सन्तुष्टि सभी पाएं
  आशा का एक दीप मन में जलाएं
       मन-मंदिर को रौशन बनाएं
चलो ! एक दिया आज मन में जलाएं  ।।

भय, कुण्ठा संदेह भी ,मन को हैं घेरे
दुख के बादल छाये ,चहुँओर घनेरे ।
खुशी का एक दीप मन में जलाएंं
    मन मंदिर को रौशन बनाएं
चलो !एक दिया आज मन में जलाएं ।।
अबकी दिवाली मन को रौशन बनाएं.....

गुरुवार, 5 अक्तूबर 2017

आराम चाहिए......


                             
                                                                       
आज हर किसी को आराम चाहिए
 न हो हाथ मैले,न हो पैर मैले....
ऐसा अब कोई काम चाहिए....
बिन हिले-डुले कुछ नया कर दिखायेंं !!
हाँ ! सुर्खियों में अपना अब नाम चाहिए
आज हर किसी को आराम चाहिए.....

मुश्किलें तो नजर आती हैं सबको बड़ी-बड़ी,
स्वयं कुछ कर सकें, ऐसी हिम्मत नहीं पड़ी ।
सब ठीक करने वाला, अवतारी आये धरा पर,
नरतनधारी कोई "श्रीकृष्ण या श्रीराम" चाहिए !!
आज हर किसी को आराम चाहिए.........

बच्चों को दिखाते हैं, ये अन्तरिक्ष के सपने !
जमीं में नजर आये न इनको कोई अपने
जमींं में रखा क्या, मिट्टी से है घृणा .....
पर घर में भरे अन्न के गोदाम चाहिए !!
आज हर किसी को आराम चाहिए.........

माँ-बाप मुसीबत लग रहे हैंं इनको आज ,
कटी पतंग सा उड़ रहा है अब समाज ।
दो शब्द बड़ों के चुभते है शूल से !
मेहनत करें भी कैसे,नाजुक हैं फूल से....?
आज को यूँ ही गवां रहे तो क्या....?
"कल मिलेगी हर खुशी" ये इन्तजाम चाहिए !!
आज हर किसी को आराम चाहिए........

                         चित्र-साभार गूगल से...










सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी.......






सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
रो-रो कर सहती प्रताड़ना को
नियति मानती थी....
जैसे कीलों के आसन पर ,
कोई कुत्ता पल पल रोता....
जब चुभती कीलें उठ जाता
फिर थककर सोता......
फिर बैठ वहीं, दुखकर
बस थोड़ा उठ जाता....
पर कभी ना कोशिश करता
आसन से बाहर आने की ,
अपने भारत की भी कुछ,ऐसे ही कहानी थी...
तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी.....
गर रोष में आकर कोई 
आवाज उठा देता......
दुश्मन से फिर अपना
सर्वस्व लुटा देता......
इस डर से चुप सहना ही सबने ठानी थी....
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
बड़ी कोशिश से बापू ने
सोयों को जगाया था........
आजादी का सपना 
फिर सबको दिखाया था.......
अंग्रेज चले जायेंं ,
फिर देश सम्भालेंगे.........
घर के लफड़े जो हैं ,
हम मिलकर निबटा लेंगे.......
मन में भावना ऐसी, बापू ने ठानी थी....
जब सोयी थी जनता, स्वीकार गुलामी थी....
दुश्मन तो हार गया !
अपनो ने हरा डाला....
आजाद किया जिस देश को
टुकड़े में बदल डाला.......
विरोधी तत्वों की मिली भगत पुरानी थी......
तब सोयी थी जनता स्वीकार गुलामी थी.....
भला किया जिनका....
अपमान मिला उनसे
सीधे सच्चे बापू...
धोखे मिले अपनो से.......
अब भी ना जाने क्या जनता ने ठानी थी.....
तब सोयी थी जनता स्वीकार गुलामी थी....
काफी था बापू जो
कर चुके थे तब तक तो
सरकार ने सत्ता में सियासत जो निभानी थी...
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी....
जो होना था सो हो गया,
बापू के हिस्से दोष गया....
आजादी के बदले में बदनामी
अहिंसा के बदले में, हत्या.....
बचा-खुचा जो मान है जनता आज  मिटाती है
जन्म-दिवस पर उनकी जयन्ती ऐसे मनाती है ?..
आलोचक उनकी करनी में
पानी फेरे जाते हैं.......
जो खुद कुछ कर न सके
बापू को मिटाते हैं.......
इतिहास बन गये जो ,उनको इतिहास ही रहने दो......
परकर्मों को कहते कहते,निज कर्म ही मत भूलो.....
"आज"तो तुम हो देश के, तुम ही कुछ आज करो....



सोमवार, 18 सितंबर 2017

चुप सो जा....मेरे मन ....चुप सो जा....!!!

   

       रात छाई है घनी ......
   पर कल सुबह होनी नयी,
   कर बन्द आँखें , सब्र रख तू ;
    मत रो ,मुझे न यूँ सता.......
*चुप सो जा........मेरे मन.......चुप सो जा*.....!!!
     तब तक तू चुप सोया रह !
     जब तक न हो जाये सुबह ;
   नींद में सपनों की दुनिया तू सजा .........
*चुप सो जा.........मेरे मन......चुप सो जा*.......!!!
      सोना जरुरी है, नयी शुरुआत करनी है ,
      भूलकर सारी मुसीबत, आस भरनी है ;
   जिन्दगी के खेल फिर-फिर खेलने तू जा.....
*चुप सो जा......मेरे मन........चुप सो जा*............!!!
     सोकर जगेगा, तब नया सा प्राण पायेगा ,
    जो खो दियाअब तक, उसे भी भूल जायेगा ;
   पाकर नया कुछ, फिर पुराना तू यहाँ खो जा.......
*चुप सो जा ..........मेरे मन.........चुप सो जा*.........!!!
    दस्तूर हैं दुनिया के कुछ, तू भी सीख ले ;
     है सुरमई सुबह यहाँ,  तो साँझ भी ढ़ले ,
    चिलमिलाती धूप है, तो स्याह सी है रात भी....
     है तपिश जब दुपहरी,तो छाँव की सौगात भी...
     दुःख नरक से लग रहे तो, स्वर्ग भी है जिन्दगी ;
     चाह सुख की है तुझे तो ,कर ले तू भी बन्दगी....!
       पलकों में उम्मीदों के सपने तू सजा...... ...!
चुप सो जा.......मेरे मन...........चुप सो जा...........!!!
                                                               
                                            चित्र- "साभार गूगल  से"

बुधवार, 13 सितंबर 2017

जाने कब खत्म होगा ,ये इंतज़ार......




 ये अमावस की अंधेरी रात
तिस पर अनवरत बरसती
           ये मुई बरसात...
और टपक रही मेरी झोपड़ी
          की घास-फूस......
भीगती सिकुड़ती मिट्टी की दीवारें 
जाने कब खत्म होगा  ये इन्तजार ?
            कब होगी सुबह.....?
   और मिट जायेगा ये घना अंधकार !
थम ही जायेगी किसी पल फिर यह बरसात
            तब चमकेंगी किरणें.......
    रवि की खिलखिलाती गुनगुनी सी ।
सूख भी जायेंगी धीरे-धीरे ये भीगी दीवारें
             गुनगुनायेंगी गीत.....
आशाओं के,मिट्टी की सौंधी खुशबू के साथ ।
   झूम उठेगी इसकी घास - फूस की छत
           बहेगी जब मधुर बयार.......
 फिर भूल कर सारे गम करेंंगे यूँ पूनम का इंतज़ार !
      जब रात्रि में भी चाँद की चाँदनी में
            साफ नजर आयेगी......
  मेरी झोपड़ी,  अपने अस्तित्व के साथ ........

          
                                         चित्र - "साभार गूगल से"

सोमवार, 4 सितंबर 2017

आओ बुढ़ापा जिएं......




वृद्धावस्था अभिशाप नहीं.... यदि आर्थिक सक्षमता है तो मानसिक कमजोरी शोभा नहीं देती ..........सहानुभूति और दया का पात्र न बनकर, मनोबल रखते हुए आत्मविश्वास के साथ वृद्धावस्था को भी जिन्दादिली से जीने की कोशिश जो करते हैंं , वे वृृद्ध अनुकरणीय बन जाते है.....




जी लिया बचपन ,जी ली जवानी.....
      आओ बुढापा जिएं ।
यही तो समय है, स्वयं को निखारें.....
     जानेंं कि हम कौन हैं .......?

     तब नाम पहचान था.....
फिर हुआ काम पहचान अपनी
    आगे रिश्तों से जाने गये.....
 सांसारिकता में स्वयं खो गये ।
शरीर तो है साधन जीवन सफर का
      ये पहचान किरदार हैं.....
कहाँ से हैं आये ? कहाँँ हमको जाना.....?
      अपना सफर है जुदा......
यही तो समय है स्वयं को पहचाने
        जाने कि हम कौन हैं ........?

क्या याद बचपन को करना ,
 क्या फिर जवानी पे मरना ,
   यही मोह माया रहेगी.....
फिर - फिर ये काया मिलेगी ....
भवसागर की लहरों में आकर 
   क्या डूबना क्या उतरना......?
हाँ क्या डूबना...क्या उतरना....... 
जरा ध्यान प्रभु का करें हम,
तनिक ज्ञान खुद को भी दें अब.....
यही तो समय है , स्वयं को निखारें 
जाने कि हम कौन हैं.........?

अभिशाप क्यों हम समझें इसे ...
     निरानन्द तन ही तो है.......
आनन्द उत्साह मन में भरे तो,
    जवाँ आज भी मन ये है.......
 हाँ ! जवाँ आज भी मन तो है.......
अतीती स्मृतियों से निकलेंं अगर
     अपना भी नया आज है.....
जिन्दादिली से जिएं जो अगर
     बुढापा नया साज है.......
नयेपन को मन से स्वीकार कर लें,
     सीखे हुनर कुछ नये....
समय बीत जाये कब और कहाँ ?
      पता भी न हमको चले....
बचे गर समय तो अध्यात्म अपनायें.....
शायद कहीं कुछ हम जान पायें
सफर को अपना सुगम हम बनायें
यही तो समय है स्वयं को निखारें
        जाने कि हम कौन हैं ?.....

क्या रोना... क्या पछताना ?
क्या क्या किया क्यों गिनाना.......
    हम वृक्ष ऊँचे सबसे बड़े.......
छाँव की आस फिर क्यों लगाना
  सबको क्षमा, प्यार देंगे अगर,
    ऊपर से वह छाँव देगा.....
जीवन का अनुभव है साथ अपने
      क्या डरना कोई घाव देगा........?
मन को अब मजबूत अपना बनाएंं
      मूल्यांकन स्वयं का करें......।
अनुभव की सम्पदा हम बाँट जायेंं...
     अध्यात्म अपना इतना बढ़ायें......
मुक्ति / मौक्ष क्या है ! "ये हम जान पाये"
  यही तो समय है स्वयं को निखारें
         जानें कि हम कौन हैं.....?

कुछ ऐसा बुढ़ापा हम जीकर दिखायें
नहीं डर किसी को बुढ़ापे का आये....
बदलें सोच उनकी जो बोझ कहते,
पुनः नवयुवाओं से सम्मान पायेंं ।
प्राचीन हिन्दत्व लौटा के लायें......
यही तो समय है स्वयं को निखारें
     जानेंं कि हम कौन हैं.......?
                                              चित्र: गूगल से साभार...

रविवार, 27 अगस्त 2017

कृषक अन्नदाता है....





आज पुरानी डायरी हाथ लग गयी,टटोलकर देखा तो यह रचना आज के हालात पर खरी उतरती हुई दिखी ,आज किसानों की स्थिति चिन्ताजनक है........ मुझे अब याद नहीं कि तब  करीब 30 वर्ष पहले किन परिस्थितियों से प्रभावित होकर मैंने यह रचना लिखी होगी ?........कृषकोंं की चिन्ताजनक स्थिति या फिर लोगों में बढ़ती धनलोलुपता.........?
तब परिस्थितियाँ जो भी रही हो................अपने विद्यार्थी जीवन के समय की रचना आप लोगों के साथ साझा कर रही हूँ.................आप सभी की प्रतिक्रिया के इंतज़ार में---------"मेरे छुटपन की कविता"



कागज का छोटा सा टुकड़ा (रुपया)
पागल बना देता है जन को
खेती करना छोड़कर
डाकू बना रहा है मन को...।

इसके लिए ही भाग रहे
श्रमिक मजदूर सिपाही....
इसी के लिए दौड़-भागकर
देते हैं सब सुख - चैन को भी तबाही....

हे देश के नवजवानोंं !
सुनो प्रकृति का़ संदेश...
इसके पीछे मत भागो,
यह चंचल अवशेष......

कृषकों के मन को भी
अगर रुपया भा जायेगा....
तो खेती छोड़कर उनको भी
दौड़ना ही भायेगा....

फिर कृषक जन भी खेती
छोड़ रुपया कमायेंगे ....
तब क्या करेंंगे पूँजीपति ,
जब अन्न कहीं नहीं पायेंगे......?

रुपये को सब कुछ समझने वालों
एक बार आजमा लो...
कृषकों की शरण न जाकर तुम,
रुपये से भूख मिटा लो.....

भूख अन्न से ही मिटती है,
कृषक अन्नदाता है.......
वह गरीब भूखा रोता है,
फिर किसको क्या भाता है !!......?

सोमवार, 21 अगस्त 2017

" धरती माँ की चेतावनी "






     मानव तू संतान मेरी  
मेरी ममता का उपहास न कर ।
  सृष्टि - मोह वश मैंं चुप सहती,
अबला समझ अट्टहास न कर ।
 
    सृष्टि की श्रेष्ठ रचना तू !
  तुझ पर मैने नाज़ किया ।
   कल्पवृक्ष और कामधेनु से ,
अनमोल रत्नों का उपहार दिया ।

 क्षुधा मिटाने अन्न उपजाने,
   तूने वक्ष चीर डाला मेरा ।
 ममतामयी - माँ  बनकर  मैने,
    अन्न दे , साथ दिया तेरा ।
 
  तरक्की के नाम पर तूने ,
खण्ड -खण्ड किया मुझको ।
    नैसर्गिकी छीन ली मेरी ,
 फिर भी माफ किया तुझको ।

 पर्यावरण प्रदूषित करके तू ,
    ज्ञान बढाये जाता है ।
 अंतरिक्ष तक जाकर तू ,
     विज्ञान बढाये जाता है ।

वृक्षों को काटकर तू अपनी
   इमारत ऊँची करता है ।
प्राण वायु दूषित कर अब ,
खुद मास्क पहनकर चलता है ।

गौमाता को आहार बना तू,
  दानव जैसा बन बैठा ।
चल रहा विध्वंस की राह पर तू ,
  सर्वनाशी बनकर ऐंठा ।

दानव बनकर जब जब तूने ,
मानवता का धर्म भुलाया ।
आकर सृष्टि संरक्षण में मैंने,
फिर फिर तेरा दर्प मिटाया ।

अभी वक्त है संभल ले मानव !
खिलवाड़ न कर तू पर्यावरण से ।
संतुलन बना प्रकृति का आगे,
बाहर निकल दर्प के आवरण से ।

चेतावनी समझ मौसम को कुदरत की !
वरना तेरी प्रगति ही तुझ पर भारी होगी ।
    अब तुझ पर ही तेरे विनाश की ,
        हर इक जिम्मेदारी होगी........।


शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

सियासत और दूरदर्शिता.....


                                                           

प्रभु श्री राम के रीछ-वानर हों या,
श्री कृष्ण जी के ग्वाल - बाल...

महात्मा बुद्ध के परिव्राजक हों या,
महात्मा गाँधी जी के  सत्याग्रही.....

दूरदर्शी थे समय के पारखी थे,
समय की गरिमा को पहचाने थे.....

अपनी भूमिका को निखारकर
जीवन अपना संवारे थे......

आजकल भी कुछ नेता बड़े दूरदर्शी हो गये,
देखो ! कैसे दल-बदल मोदी -लहर में बह गये.....

इसी को कहते हैं चलती का नाम गाड़ी,
गर चल दिया तो हुआ सयाना......
...................छूट गया तो हुआ अनाड़ी....

नीतीश जी को ही देखिये, कैसे गठबंधन छोड़ बैठे !
व्यामोह के चक्रव्यूह से, कुशलता से निकल बैठे !....

दूरदर्शिता के परिचायक नीतीश जी.......
 राजनीति के असली दाँव पेंच चल बैठे......

भाजपा का दामन पकड़ अनेक नेता सफल हो गये
दल - बदलू बनकर ये सियासत के रंग में रंग लिये.........।

बहुत बड़ी बात है,देशवासियों का विश्वासमत हासिल करना !
उससे भी बड़ी बात है विश्वास पर खरा उतरना.....
आगे - आगे देखते हैं भाजपा करती है क्या....?
 सभी के विश्वास पर खरी भी उतरती है क्या............???
                                                                                                चित्र साभार गूगल से.....

बुधवार, 2 अगस्त 2017

*कुदरत की मार*



देखो ! अब का मनभावन सावन,
 कैसे  अस्त-व्यस्त  है जीवन !
कहीं पड़ रही उमस भरी गर्मी, 
कहींं मौसम की ज्यादा ही नर्मी.....

कहीं भरा है पानी - पानी,
कहीं बाढ़ देख हुई हैरानी !
कहीं घर में भर आया पानी ,
घर छोड़ी फिर मुनिया रानी.......

भीगी सारी किताबें उसकी,
भीग  गया  जब  बस्ता...
कैम्पस में दिन काट रहे,
खाने को मिले न खस्ता....

घर पर बछिया छोटी सी
बाँधी थी वह  खूँटी  से...
वहीं बंधी गौरा(गाय) प्यारी....
दूध निकाले थी महतारी

कैसी होगी बछिया बेचारी,
क्या सोची होगी गौरा प्यारी....?
छोड़ा उनको खुद आ भागे !!
उन सबका वहाँ कौन है आगे...?

सूखी थी जब नदी गर्मी में
तब कचड़ा फैंके थे नदी में....?
रास्ता जब नदी का रोका......
पानी ने घर आकर टोका !

मौसम को बुरा कहते अब सब,
सावन को "निरा" कहते हैंं सब ।
मत भूलो अपनी ही करनी है ,
फिर ये सब खुद ही तो भरनी है......

राजस्थान हुआ बाढ़ से बेहाल,
गुजरात  का भी है  बुरा हाल....
पहाड़ों पर हो रहा भूस्खलन.....
कहीं बादल फटने का है चलन ।

"विज्ञान" खड़ा मुँह ताक रहा !
"प्रगति" भी सिर धुनकर रोती है !
कुदरत "विध्वंस" पर आयी है
"बोलो अब करोगे क्या ???
ललकार के हमसे कहती है......

देख ली पर्यावरण की विनाश-लीला !!
सम्भल सकें तो सम्भलना है.......
अब "पर्यावरण - सुरक्षा"  का...
हर मानव को व्रत करना है ......
                                                 चित्र गूगल से साभार.....

रविवार, 30 जुलाई 2017

तुम और वो.....


तुम तो तुम हो न ........अप्राप्य को हर हाल मेंं प्राप्त करना तुम्हारी फितरत भी है, और पुरुषार्थ भी......
जब तक अलभ्य है, अनमोल है.......उसे पाना ही तो है तुम्हारा सपना, तुम्हारी मंजिल.......
प्राप्त कर लिया ,बस...जीत गये...... ....अब क्या.......कुछ भी नहीं......कोई मोल नहीं ......
घर में डाल दिया सामान की तरह.........और फिर शुरू तुम्हारे नये सपने ,नयी मंजिल........
इधर वो पगली ! और उसके स्वयं से समझौते.......फिर नसीब समझ तुम्हारी निठुराई से भी प्रेम......
.उफ ! हद है पागलपन की........

नफरत के बीज तुम उगाते रहे
वो प्रेम जल से भिगाती रही
दूरियां इस कदर तुम बढाते रहे
पास आने की उम्मीद लगाती रही

तुम छीनने की कोशिश में थे
उसने ये अवसर दिया ही कहाँ ?
तुम मुट्ठी भर चुराने चले
वो अंजुल भर लुटाती रही

मनहूस कह जिसे दरकिनार कर
तुम बेवफाई निभाने चले
किस्मत समझ कर स्वीकार कर
वो एतबार अपना बढ़ाती रही

क्रोध की आग में तुम जलते रहे
प्रेम से मरहम वो लगाती रही
तुम्ही खो गये हो सुख-चैन अपना
वो तो तुमपे ही बस मन लगाती रही

तुम पाकर भी सुखी थे कहाँ ?
वो खोकर भी पाती रही
तुम जीत कर भी हारे से थे
तुम्हारी जीत का जश्न वो मनाती रही

वक्त बीता तुम रीते से हो
अपनो के बीच क्यों अकेले से हो ?
प्रेम  और सेवा कर जीवन भर
वो गैरों को अपना बनाती रही........

सुख दुख की परवाह कहाँ थी उसे
बस तुम्हें खुशी देने की चाह में
नये-नये किरदार वो निभाती रही
वो एतबार अपना बढ़ाती रही...

रविवार, 23 जुलाई 2017

"एक सफलता ऐसी भी"


मिठाई का डिब्बा मेरी तरफ बढाते हुए वह मुस्कुरा कर बोली  "नमस्ते मैडम जी !मुँह मीठा कीजिए" मैं मिठाई उठाते हुए उसकी तरफ देखकर सोचने लगी ये आवाज तो मंदिरा की है परन्तु चेहरा......नहीं नहीं वह तो अपना मुंह दुपट्टे से छिपा कर रखती है ....नहीं पहचाना मैडम जी... मैं मंदिरा .(सुनकर मेरी तो जैसे तन्द्रा ही टूट गयी)... ..मंदिरा तुम ! मैने आश्चर्य से पूछा.... यकीनन मैं उसे नहीं पहचान पायी ,पहचानती भी कैसे....मंदिरा तो अपना चेहरा छिपाकर रखती है ....न रखे तो करे क्या बेचारी,पल्लू सर से हटते ही सारे बच्चे चिल्ला उठते हैं,  भूत.......आण्टी !आपका चेहरा कितना डरावना है !!!

उसका होंठ कटा हुआ था,  जन्म से...इसीलिए तो हमेशा मुँह दुपट्टे से ढ़ककर रखती है वह.....पर आज तो होंठ बिल्कुल ठीक लग रहा था...ना ही उसने मुँह छिपाया था औऱ न ही इसकी जरूरत थी ।

मैने मिठाई उठाते हुए उसके मुँह की तरफ इशारा करते हुए पूछा कैसे ? और सुना है तुमने काम भी छोड़ दिया ..?
वह मुस्कुराते हुए बोली..."अभी आप मुँह मीठा कीजिये मैडम जी !  बताती हूँ ....आप सबको बताने ही तो आयी हूँ ,.मैंं सोची सब बोलते होंगे मंदिरा चुपचाप कहाँ चली गयी ?.....इसलिये ही मैं आई".........

बाद में  उसने हमें बताया कि उसका बेटा army मेंं भर्ती हो गया है..."बड़े होनहार है मेरे दोनो बेटे.... बेटे ने मिलिट्री अस्पताल में मेरे मुँह की सर्जरी करवाई......और मुझे काम छोड़ने को कहा है.........मेरा छोटा बेटा इंजीनियर बनना चाहता है.....बड़े बेटे ने कहा है खर्चे की चिन्ता नहीं करना , बस पढ़ाई कर मन लगाके और बन जा इंजीनियर.... अब हमने झोपड़ पट्टी(जहाँ वो रहते थे) भी छोड़ दी, चौल में किराए का घर लिया है ....वहाँ अच्छा माहौल नहींं था न पढ़ने  के लिए.....ऊपर वाले ने साथ दिया मैडम जी.....बड़ी कृपा रही उसकी".........कहते हुये मंदिरा के चेहरे पर संतोष और गर्व के भाव थे ।

उसे सुनते हुये मुझे ऐसा लग रहा था मानो मै दुनिया की सबसे कामयाब औरत से बात कर रही हूँ.....
उसने बताया कि कैसे उसने अपने बच्चों को पढ़ाया....... कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा उसे जीवन में ...
कटे होठों के कारण उसे क्या क्या सहना पड़ा...... तीन बहनोंं में सबसे छोटी थी मंदिरा.......दो बड़ी बहनों का रिश्ता अच्छे जमीन -जायदाद वाले घर में हुआ, मंदिरा के इस नुक्स के कारण कोई अच्छा खानदानी रिश्ता उसके लिए नहीं आया....... तब बड़ी मुश्किल से इस मेहनत -मजदूरी करने वाले शराबी के हाथ उसे सौंप दिया गया....उसका जीवन बद से बदतर हो गया.....

उच्च आकांक्षी मंदिरा ने हार नहीं मानी.......उसने मन ही मन ठान लिया कि अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर वह अपनी स्थिति में सुधार करेगी.......बच्चों की पढ़ाई का खर्चा जब शराबी पियक्कड़ पति की कमाई से न हो पाया तो उसने खुद काम करना शुरू किया......लोगोंं के घर-घर जाकर बर्तन मांजे...झाड़ू-पोछा किया.... जो पैसा मिला उसे स्कूल फीस के लिए जमा करने लगी ....शराबी पति ने वो पैसे उससे छीन लिए उसे मानसिक, शारीरिक प्रताड़नाएं तक सहनी पड़ी....फिर उसने अपने कमाये पैसे अपनी मालकिन के पास ही छोड़े और जरुरत पड़ने पर ही लिए......उसके पति को  जब उसके पास पैसे न मिले तो उसने उसे तरह-तरह की यातनाएं दी....उसके पति के लिए बच्चों की पढ़ाई वगैरह का कोई महत्व नहीं था ।

झोपड़ पट्टी के बाकी बच्चे भी तो  स्कूल नहीं जाते थे...सभी बच्चे या तो भीख माँगते या कोई काम करते....... इसलिए भी उसके पति को और गुस्सा आता था उस पर ...............वह चाहता था कि उसके बच्चे भी तमाम बच्चों की तरह उसका हाथ बँटायें......

ऐसे माहौल में बच्चों का मन पढ़ने-लिखने मेंं लगाना भी उसके लिए चुनौती पूर्ण था......वह अपने बच्चों को प्रेरणादायक कहानियाँ सुनाती.......उन्हें वहाँ ले जाती जहाँ वह काम पर जाती........बड़े लोगों के रहन-सहन और ऐशो-आराम की तरफ उनका ध्यान आकर्षित करती.......

अंततः उसकी मेहनत रंग लायी......ज्यो -ज्यों बच्चे बढ़ने लगे उनका मन स्वतः ही पढ़ने में लगने लगा........वे पढ़ाई का मतलब समझ गये.......नतीजा सबके सामने है........आज मंदिरा को सब बधाई दे रहे हैं......भूत कहकर चिल्लाने वाले बच्चे भी मंदिरा आण्टी को घूर-घूर कर देख रहे थे....पिछले दो सालों से मंदिरा इस स्कूल में काम कर रही थी.....वह अपना काम बहुत ही अच्छी तरह बड़े ध्यान से करती आई.......कभी किसी को कोई शिकायत का अवसर नहीं दिया उसने......

हम स्वयं प्रेरित होने या छोटों को प्रेरणा देने के लिए बहुत बड़ी -बड़ी कामयाब हस्तियांँ चुनते हैंं.....बड़े-बड़े सफल लोगों का नाम लेते हैंं.........हमारे आस-पास ही बहुत से ऐसे लोग रहते हैं ,जो विषम परिस्थितियों के बावजूद कठिन परिश्रम से अपना मुकाम हासिल कर लेते हैं....मेरी नजर में यह भी बड़ीऔर महत्वपूर्ण सफलता है.......और ऐसे लोग भी किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से कम नहीं हैं़

आशा है कि झोपड़ पट्टी के बाकी लोग भी अपने बच्चों को शिक्षित करना चाहेंगे... मंदिरा की तरह अपने बच्चों के सुखद भविष्य का प्रयास जरूर करेंगे. ।


                  

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

भीख माँगती छोटी सी लड़की



जूस(fruit juice) की दुकान पर,
   एक छोटी सी लड़की....
एक हाथ से,  अपने से बड़े,
   फटे-पुराने,मैले-कुचैले
      कपड़े सम्भालती.....
एक हाथ आगे फैलाकर सहमी-सहमी सी,
         सबसे भीख माँगती.......

वह छोटी सी लड़की उस दुकान पर
     हाथ फैलाए भीख माँगती....
आँखों में शर्मिंदगी,सकुचाहट लिए,
      चेहरे पर उदासी ओढे......
ललचाई नजर से हमउम्र बच्चों को
       सर से पैर तक निहारती.......
वह छोटी सी लड़की ,खिसियाती सी,
         सबसे भीख माँगती.......

कोई कुछ रख देता हाथ में उसके ,
        वह नतमस्तक हो जाती......
कोई "ना" में हाथ हिलाता,तो वह
       गुमसुम आगे बढ जाती.....
     
अबकी  जब उसने हाथ  बढाया,
    सामने एक सज्जन को पाया.....
सज्जन ने  निज हाथों  से अपनी,
      सारी जेबों को थपथपाया........
लड़की आँखों में  उम्मीदें  लेकर,
       देख रही विनम्र वहाँ पर......

सज्जन ने "ना" में हाथ हिलाकर,
   बच्ची की तरफ जब देखा.......
दिखाई दी  उनको भी  शायद,
     टूटते उम्मीदों  की  रेखा......

बढ़ी तब आगे वह होकर  निराश.....
     रोका सज्जन ने उसे........
बढा दिया उसकी तरफ, अपने
     जूस का भरा गिलास......

लड़की   थोड़ा  सकुचाई, फिर
 मुश्किल से  नजर  उठाई ।
सज्जन की आँखों में उसे,
 कुछ दया सी नजर आई।
फिर हिम्मत उसने बढाई......

देख रही थी यह सब मैं भी,
   सोच रही कुछ आगे.....
कहाँ है ये सब नसीब में उसके
   चाहे कितना भी भागे.....
जूस  देख  लालच  वश  झट से,
      ये गिलास झपट जायेगी......
एक ही साँस में जूस गटक कर ये
      आजीवन इतरायेगी.......

परन्तु ऐसा हुआ नहीं, वह तो
   साधारण भाव में थी......
जूस लिया कृतज्ञता से और,
  चुप आगे बढ दी.......

हाथ में जूस का गिलास लिए, वह
        चौराहे पार गई..........
अचरज वश मैं भी उसके फिर
        पीछे पीछे ही चल दी.........

चौराहे पर ; एक टाट पर बैठी औरत,
  दीन मलिन थी उसकी सूरत...
नन्हा बच्चा गोद लिए वह, भीख
   माँगती हाथ बढ़ाकर.....

लड़की ने उस के पास जाकर,
 जूस का गिलास उसे थमाया ।
और उसने नन्हे बच्चे को बड़ी
     खुशी से जूस पिलाया.....

थोड़ा जूस पिया बच्चे ने, थोड़ा-सा
       फिर बचा दिया.....
माँ ने ममतामय होकर, लड़की को
       गिलास थमा दिया.....
बेटी ने गिलास लेकर, माँ के होठों
        से लगा लिया.....
माँ ने एक घूँट छोटी सी पीकर,सर पर
     उसकी थपकी देकर......
  बड़े लाड़ से पास बिठाया ,
फिरअपने हाथों से उसको, बचा हुआ
      वह जूस पिलाया.....
देख प्रेम की ऐसी लीला,मेरा भी
     हृदय भर आया........

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

"मन और लेखनी"




लिखने का मन है,......
लिखती नहीं लेखनी,
लिखना मन चाहता,
कोई जीवनी कहानी ।
शब्द आते नहीं, मन
बोझिल है दुःखी लेखनी ।
लिखने का मन है.......
लिखती नहीं लेखनी ।
मन मझधार में है .......
लेखनी पार जाना चाहती,
मन में अपार गम हैं....
लेखनी सब भुलाना चाहती ।
सारे दुखों  को भूल.......
अन्त सुखी बनाना चाहती,
मन मझधार में है.....
लेखनी पार जाना चाहती ।
चन्द लेख बन्द रह गये,
यूँ  ही  किताबों  में........
जैसे कुछ राज छुपे हों ,
जीवन की यादों में......
वक्त बेवक्त उफनती ,
लहरेंं "मन-सागर" में........
देखो ! कब तक सम्भलती
हैं, ये यादें जीवन में.........?
लेखनी समझे उलझन,
सम्भल के लिख भी पाये......
वो लेख ही क्या लिखना.....
जो "सुलझी-सीख" न दे पाये.......

शनिवार, 1 जुलाई 2017

अहंकार



मानसूनी मौसम में बारिश के चलते,
सूखी सी नदी में उफान आ गया ......
देख पानी से भरा विस्तृत रूप अपना,
इतराने लगी नदी, अहंकार छा गया.....
बहाती अपने संग कंकड़-पत्थर,
फैलती काट साहिल को अपने......

हुई गर्व से उन्मत इतनी,
पास बने कुएं से उलझी.......
बोली कुआं ! देखो तो मुझको,
देखो ! मेरी गहराई चौड़ाई ,
तुम तो ठहरे सिर्फ कूप ही ,
मैं नदी कितनी भर आयी !....

शक्ति मुझमें इतनी कि सबको बहा दूँ ,
चाहूँ  गर  तो  तुमको भी खुद में समा दूँ....
मैं उफनती नदी हूँ. ! देखो जरा मुझको,
देखो !बढ रही कैसे मेरी गहराई चौड़ाई...

मेरा नीर हिल्लौरें भरता,
मंजिल तक जायेंगे हम तो....
कूप तू सदा यहीं तक सीमित,
सागर हो आयेंगे हम तो......

कुआं मौन सुन रहा,नदी को ,
नहीं प्रतिकार किया तब उसने.....
जैसे  दादुर  की टर्र - टर्र से ,
कोयल मौन हुई तब खुद में......

चंद समय में मौसम बदला ,
बरसाती जल अब नहीं बरसा....
नदी बेचारी फिर से सूखी
पुनः पतली धारा में बदली......

कुआं नदी को सम्बोधित करके,
फिर बोला  मर्यादित  बनके.......
सुनो नदी !कुछ अनुभव मेरे,
विस्तार ही सब कुछ नहीं बहुतेरे.....

गुणवत्ता बिन व्यर्थ है जीवन ,
बिन उद्देश्य दिग्भ्रमित सा मन....
लक्ष्यविहीन व्यर्थ है विस्तार,
विनाशकारी  है अहंकार.......

क्षमा प्रार्थी संकुचित हो नदी बोली,
गलत किया जब "स्व" को भूली......








बुधवार, 28 जून 2017

लौट आये फिर कहीं प्यार...




सांझ होने को है......
रात आगे खडी,
बस भी करो अब शिकवे,
बात बाकी पडी........
सुनो तो जरा मन की.,
वह भी उदास है ।
ऐसा भी क्या है तड़पना
अपना जब पास है ।
ना कर सको प्रेम तो,
चाहे झगड़ फिर लो.......
नफरत की दीवार लाँघो,
चाहे उलझ फिर लो......
शायद सुलझ  भी जाएंं
खामोशियों के ये तार......
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार....?

खाई भी गहरी सी है,
तुम पाट डालो उसे.......
सांझ ढलने से पहले,
बाग बना लो उसे.........
नन्हींं नयी पौध से फिर,
महक जायेगा घर-बार .........
लौट आयें बचपन की यादें....
लौट आये फिर कहीं प्यार....?

अहम को बढाते रहोगे
स्वयं को भुलाते रहोगे....
वक्त हाथों से फिसले तभी,
कर न पाओगे तुम कुछ भी सार....
सांझ ढलते समझ आये भी,
बस सिर्फ पछताते रहोगे......
लौट आओ जमीं ताकती है,
वक्त कम है,राह झांकती है.....
रात तम में गिरोगे कहाँ तुम,
राह धुंधली हुई जा रही है......
दूरियां ज्यों बढाते रहोगे,
गिरकर उतने ही टुकड़े सहोगे....
टुकड़े- टुकड़े में ही जो सही ,
आने की तो डगर है यहीं ......
यही है इस जीवन का सार...
तुम भी समझो जमीं का ये प्यार......
लौट आओ वहींं से जहाँँ हो,
बन भी जाये पुनः परिवार......
लौट आयेंं बचपन की यादें,
लौट आये फिर कहीं प्यार......?
                                               चित्र साभार गूगल से......

                         



गुरुवार, 22 जून 2017

समय तू पंख लगा के उड़ जा......







माँँ !  मुझे भी हॉस्टल में रहना है,मेरे बहुत से दोस्त हॉस्टल में रहते हैं, कितने मजे है उनके !....हर पल दोस्तों का 
साथ.........नहीं कोई डाँट-डपट.....न ही कोई किचकिच......
मुझे भी जाना है हॉस्टल, शौर्य अपनी माँ से कहता.... माँ उसे समझाते हुए कहती "बेटा ! जब बड़े हो जाओगे तब तुम्हे भी भेज देंगे हॉस्टल....फिर तुम भी खूब मजे कर लेना"......
समझते समझाते शौर्य कब बड़ा हो गया पता ही नहीं चला, और आगे की पढ़ाई के लिए उसे भी हॉस्टल भेज दिया गया। बहुत अच्छा लगा शुरू-शुरू में शौर्य को हॉस्टल मेंं......परन्तु जल्दी ही उसे घर और बाहर का फर्क समझ में आने लगा......
अब वह घर जाने के लिए छुट्टियों का इन्तजार करता है,
और घर व अपनोंं की यादों में कुछ इस तरह गुनगुनाता है....



*समय तू पंख लगा के उड़ जा....
उस पल को पास ले आ...
जब मैंं मिल पाऊँ माँ -पापा से ,
माँ-पापा मिल पायें मुझसे
वह घड़ी निकट ले आ.....
*समय तू पंख लगा के उड़ जा ।

छोटे भाई बहन मिलेंगे प्यार से मुझसे,
हम खेलेंगे और लडे़ंगे फिर से.....
वो बचपन के पल फिर वापस ले आ,
*समय तू थोड़ा पीछे मुड़ जा......

तब ना थी कोई टेंशन-वेंशन ना था कोई लफड़ा
ना आगे की फिकर थी हमको ना पीछे का मसला।
घर पर सब थे मौज मनाते खाते-पीते तगड़ा...
खेल-खेल में हँसते गाते या फिर करते झगड़ा ।

माँ-पापा की डाँट डपट में प्यार छिपा था कितना !
अपने घर-आँगन में हम सब मौज मनाते इतना ......
उन लम्होंं को रात नींद में रोज बना दे सपना !
*समय तू कुछ ऐसा कर जा ......
*समय तू पंख लगा के उड़ जा....
मैं मिल पाऊँ अपनो से वह घड़ी निकट ले आ....
*समय तू पंख लगा के उड़ जा......
     

शुक्रवार, 16 जून 2017

सुख-दुख





   दुख एक फर्ज है,
फर्ज तो है एहसान नहीं ।
  फर्ज है हमारे सर पर,
कोई भिक्षा या दान नहीं ।

 दुख सहना किस्मत के खातिर,
कुछ सुख आता पर दुख आना फिर ।
 दुख सहना किस्मत के खातिर....

    दुख ही तो है सच्चा साथी
सुख तो अल्प समय को आता है ।
    मानव जब तन्हा  रहता है,
दुख ही तो साथ निभाता है ।

फिर दुख से यूँ घबराना क्या ?
सुख- दुख में भेद  बनाना क्या ?
जीवन है तो सुख -दुख भी हैं,
ख्वाबों मे सुख यूँ सजाना क्या ?

एक  सिक्के के ही ये दो पहलू
सुख तो अभिलाषा में अटका....
दुख में अटकलें लगाना क्या ?

 मानव रूपी अभिनेता हम
सुख-दुख अपने किरदार हुए. ।
जो मिला सहज स्वीकार करें .....
सुख- दुख में हम इकसार बने.....

बुधवार, 7 जून 2017

कर्तव्य परायणता




उषा की लालिमा पूरब में
नजर आई.......
जब  दिवाकर रथ पर सवार,
गगन पथ पर बढने लगे.....
निशा की विदाई का समय
निकट था......
चाँद भी तारों की बारात संग
जाने लगे ..........

एक दीपक अंधकार से लडता,
एकाकी खडा धरा पर.....
टिमटिमाती लौ लिए फैला रहा 
प्रकाश तब......
अनवरत करता रहा कोशिश वह
अन्धकार मिटाने की......
भास्कर की अनुपस्थिति में उनके दिये
उत्तदायित्व निभाने की....
उदित हुए दिनकर, दीपक ने मस्तक
अपना झुका लिया......
दण्डवत किया प्रणाम ! पुनः कर्तव्य
अपना निभा लिया......
हुए प्रसन्न भास्कर ! देख दीपक की
कर्तव्य परायणता को......
बोले "पुरस्कृत हो तुम कहो क्या
पुरस्कार दें तुमको".......?
सहज भाव बोला दीपक, देव !
"विश्वास भर रखना"........
कर्तव्य सदा निभाऊंगा, मुझ पर
आश बस रखना.......
उत्तरदायित्व मिला आपसे,कर्तव्य मैं
निभा पाया.......
"कर्तव्य" ही सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार है ,
 जो मैने आपसे पाया......

सोमवार, 29 मई 2017

आशान्वित हुआ फिर गुलमोहर...




खडा था वह आँगन के पीछे
लम्बे ,सतत प्रयास  और  अथक,
इन्तजार के बाद आयी खुशियाँ....
शाखा -शाखा खिल उठी थी,
खूबसूरत फूलों से....
मंद हवा के झोकों के संग,
होले-होले.....
जैसे पत्ती-पत्ती खुशियों का,
जश्न मनाती......
धीमी-धीमी हिलती-डुलती,
खिलते फूलो संग......
जैसे मधुर-मधुर सा गीत,
गुनगुनाती.........
खुशियाँ ही खुशियाँ थी हर-पल,
दिन भी थे हसीन......
चाँदनी में झूमती, मुस्कुराती टहनी,
रातें भी थी रंगीन......
आते-जाते पंथी भी मुदित होते,
खूबसूरत फूलोंं पर.....
कहते "वाह ! खिलो तो ऐसे जैसे ,
खिला सामने गुलमोहर"......

विशाल गुलमोहर हर्षित हो प्रसन्न,
देखे अपनी खिलती सुन्दर काया,
नाज किये था मन ही मन......
कितना प्यारा था वह क्षण !.........

खुशियों की दोपहर अभी ढली नहीं कि -
दुख का अंधकार तूफान बनकर ढा गया,
बेचारे गुलमोहर पे....
लाख जतन के बाद भी---
ना बचा पाया अपनी खूबसूरत शाखा,
भंयकर तूफान से.......
अधरों की वह मुस्कुराहट अधूरी सी ,
रह गयी.....
जब बडी सी शाखा टूटकर जमीं पर ,
ढह गयी...........

तब अवसाद ग्रस्त, ठूँठ-सा दिखने लगा वह
अपना प्रिय हिस्सा खोकर.......
फिर हिम्मत रख सम्भाला खुद को नयी-
उम्मीद लेकर.........
करेगा फिर  अथक इंंतजार खुशियों का
नयी शाखाएं आने तक...।
पुनः सतत प्रयासरत  होकर.....
आशान्वित हुआ फिर गुलमोहर..........









रविवार, 21 मई 2017

नारी ! अब तेरे कर्तव्य और बढ़ गये.....




बढ़ रही दरिन्दगी समाज में,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ गये .......
माँ है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य औऱ बढ गये".......

संस्कृति, संस्कार  रोप बाग में ,
माली तेरे बाग यूँ उजड गये ........
दया,क्षमा की गन्ध आज है कहाँ ?
फूल में सुगन्ध आज है कहाँ ?
ममत्व,प्रेम है कहाँँ तू दे रही ?
पशु समान पुत्र बन गये .....
नारी ! तू ही पशुता का नाश कर,
समष्ट सृष्टि का नया विकास कर ।
"नारी ! तेरे फर्ज और बढ़गये".......
"अब तेरे कर्तव्य और बढ़ गये" .......

मशीनरी विकास आज हो रहा ,
मनुष्यता का ह्रास आज हो रहा ।
धर्म-कर्म भी नहीं रहे यहाँ ,
अन्धभक्ति ही पनप रही यहाँ ।
वृद्ध आज आश्रमों  में रो रहे ,
घर गिरे मकान आज हो रहे......
सेवा औऱ सम्मान अब रहा कहाँ ?
घमंड और अपमान ही बचा यहाँ ।
संस्कृति विलुप्त आज हो रही ..........
"माँ भारती" भी रुग्ण हो के रो रही ...

"माँ भारती" की है यही पुकार अब ,
"बचा सके तो तू बचा संस्कार अब"।
अनेकता में एकता बनी रहे ..........
बन्धुत्व की अमर कथा बनी रहे ।
अनेक धर्म लक्ष्य सबके एक हों ,
सम्मान की प्राची प्रथा बनी रहे .........
"सत्यता का मार्ग अब दिखा उन्हें",
"शिष्टता , सहिष्णुता सिखा उन्हे" ।
सभ्यता का बीज रोप बाग में ........
उम्मीद सभी नारी से ही कर रहे.......

दरिन्दगी मिटा तू ही समाज से,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ़ रहे ......
माँ  है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य और बढ़ गये" ........


                  चित्र गूगल से साभार.....







बुधवार, 17 मई 2017

"सैनिक---देश के"

कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छुपी का खेल ये ?.......
अब ये दुश्मन बन जायेंगे,
या फिर होगा मेल रे ?.........

उसने सैनिक मार गिराये,
तुमने बंकर उडा दिये........
ईंट के बदले पत्थर मारे,
ताकत अपनी दिखा रहे........

संसद की कुर्सी पर बैठे,
नेता रचते शेर रे...........
एक दिन सैनिक बनकर देखो,
कैसे निकले रेड रे.........

शहादत की चाह से सैनिक
कब सरहद पर जाता है ?.......
हर एक पिता कब पुत्र-मरण में,
सीना यहाँ फुलाता है ?........

गर्वित देश और गर्वित अपने भी,
ये हैंं शब्दों के फेर रे...........
कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छिपी का खेल ये ?.........

भरी संसद में नेताओं पर ,
जूते फेंके जाते हैं...........
सरहद पर क्यों हाथ बाँधकर,
सैनिक भेजे जाते हैं ?.........

अजब देश के गजब हैं नुस्खे या,
 हैं ये भी राजनीति के खेल रे ?........
कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छिपी का खेल ये ?...........

विपक्षी के दो शब्दों से जहाँ,
स्वाभिमान हिल जाते हैं........
नहीं दिखे तब स्वाभिमान जब,
पत्थर सैनिकों पर फैंके जाते हैं......
   
आजाद देश को रखने वाले,
स्वयं गुलामी झेल रहे..........
दाँत भींच ये गाली सहते,
बेचारगी सी झेल रहे............

प्राण हैं इनमें ये नहीं पुतले,
कब समझोगे भेद रे ?.........
कब तक चलता रहेगा बोलो,
लुका-छिपी का खेल रे ?.........

बिन अधिकार बिना आजादी,
करें ये कैसे मेल रे ?..........
देश-भक्ति का जज्बा ऐसे,
हो न जाये कहीं फेल रे ?.........

तनिक सैनिकों को भी समझो,
बन्द करो अब खेल ये............
ठोस नतीजे पर तो पहुँचों,
हुंकारे अब ये "शेर" रे...........

हुक्म करो तो "अमन-चैन" को,
वापस भारत लाएं ये..........
"शौर्य" देख आतंकी बंकर-
सहित रसातल जायें रे..........

दे खदेड़ आतंक जहाँ से,
"विश्व-शान्ति" फैलायें ये..........
"भारत माता"के वीर हैं ये,
संसार में माने जायें रे............





चित्र :Shutterstockसे साभार.....

रविवार, 14 मई 2017

"माँ"




माँ इतनी आशीष दें !
कर सके कोई अर्पण तुम्हें...
प्रेम से तुमने सींचा हमें
बढ सकें यूँ कि छाँव दें तुम्हें...


माँ के ख्वाबों को आबाद कर
मंजिलों तक पहुँच पायेंं हम
सपने बिखरे न माँ के कोई
काम इतना तो कर जाएंं हम

माँ के आँचल की साया तले
हम बढें तपतपी राह में...
ना डरें मुश्किलों से कभी
ना गलत राह अपनायें हम......

माँ का आशीष हमेशा रहे
प्रभु ! इतना हमें "वर" दे...
माँ से ही तो है संसार ये..
माँ के चरणों में हम बने रहें...






चित्र :-गूगल से...साभार

गुरुवार, 11 मई 2017

वीरांगना बन जाओ बिटिया....

नाजुकता अब छोडो बिटिया,
वीरांगना बन जाओ ना........
सीखो जूडो और करांटे,
बल अपना फिर बढाओ ना ।

भैया दण्ड-पेल हैं करते,
तुम भी वही अपनाओ ना ।
गुडिया से खेलना छोड़ो
मर्दानी बन जाओ ना........

मात-पिता की चिन्ता हो तुम,
रूप नया अपनाओ ना......
खेलो दंगल बवीता सा तुम,
देश का मान बढाओ ना ।

छोड़ो कोमलता भी अपनी ,
समय को मात दे जाओ ना ।
रणचण्डी,दुर्गा तुम बनकर,
दुष्टों को धूल चटाओ ना........

निर्भया ज्योति थी माँ-पापा की ,
तम उनका भी मिटाओ ना........
ऐसे दरिन्दो का काल बनो तुम ,
इतिहास नया ही रचाओ ना ।

अब कोई भी कली धरा पर ,
ऐसे रौंदी जाये ना ।
बीज पनपने से पहले ये ,
भ्रूण में कुचली जाये ना.........

दहेज के भिखमंगों को भी,
बीच सडक पर लाओ ना........
बहू जलाने वालों के घर-
आँगन आग लगाओ ना ।

बेटी वीरांगना बने जो ,
प्रबल बनेगा देश अपना ।
उत्कृष्ट समाज के नव-निर्माण से,
पूरा होगा हर सपना.....


मंगलवार, 9 मई 2017

आस हैं और भी.....राह हैं और भी....


जब कभी अकेली सी लगी जिन्दगी,
 तन्हाई भी आकर जब सताने लगी 
 आस-पास चहुँ ओर नजरें जो गयी,
 एक नयी सोच मन मेरे आने लगी......
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
 भावना गीत बन गुनगनाने लगी ..........


 मंजिल दूर थी रात छायी घनी,
चाँद-तारों से उम्मीद करने लगी
बादलों ने भी तब ही ठिठोली की
चाँद-तारे छुपे आँख-मिचौली की
घुप्प अंधेरे में डर जब सताने लगा
राह सूझी नहीं मन घबराने लगा
टिमटिमाते हुए जुगनू ने कहा .......
आस बाकी अभी टूट जाओ नहीं
मुस्कुरा दो ! जरा रूठ जाओ नहीं
है बची रौशनी होसला तुम रखो !
दिख रही राह मंजिल तक तुम चलो !
आस हैंं और भी राह हैं औऱ भी,
एक नयी सोच तब मन में आने लगी......
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी..........


करवटें जब बदलने लगी जिन्दगी
धोखे और नफरत से हुए रूबरू
फिर डरे देख जीवन का ये पहलू
विश्वास भी डगमगाने लगा
शब्द जो कहे अर्थ उल्टे हुये
हर कोशिश नाकामी दिखाने लगी
खामोशी इस कदर फिर से छाने लगी
रुक गये हम जहाँ थे वहीं हारकर
तब जीने की चाहत भी जाने लगी
एक हवा प्रेम की सरसराते हुए........
बिखरी जुल्फों को यूँ सहलाने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की,
भावना गीत बन गुनगनाने लगी.........


है राहें औऱ भी नजरे तो उठा !
उम्मीदें बढा फिर चलें तो जरा !
वजह मुस्कुराने की हैं और भी,
जो नहीं उस पर रोना तो छोड़े जरा...
यही सीख जब  अपनाने लगी
एक नयी सोच तब मन में आने लगी
*देख ऐसी कला उस कलाकार की
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी.......





रविवार, 30 अप्रैल 2017

खोये प्यार की यादें......

वो ऐसा था/वो ऐसी थी यही दिल हर पल कहता है,
गुजरती है उमर, यादों में खोया प्यार रहता है.........

भुलाये भूलते कब हैं वो यादें वो मुलाकातें,
भरे परिवार में अक्सर अकेलापन ही खलता है ।

कभी तारों से बातें कर कभी चंदा को देखें वो,
कभी गुमसुम अंधेरे में खुद ही खुद को समेटें वो ।

नया संगी नयी खुशियाँ कहाँ स्वीकार करते हैं,
उन्हीं कमियों में उलझे ये तो बस तकरार करते हैं ।

कहाँ जीते हैं ये दिल से, ये घर नाबाद रहता है,
गुजरती है उमर यादोंं में खोया प्यार रहता है..........

साथी हो सगुण फिर भी इन्हेंं कमियां ही दिखती हैं,
जो पीछे देख चलते हैं, उन्हेंं ठोकर ही मिलती हैं.।

कशमकश में रहे साथी, कमीं क्या रह गयी मुझमें
समर्पित है जिन्हेंं जीवन,वही खुश क्यों नहीं मुझमें ।

करीब आयेंगे ये दिल से, यही इन्तजार रहता है,
गुजरती है उमर यादों में खोया प्यार रहता है.......।

बडे जिनकी वजह से दूर हो जीना इन्हेंं पडता,
नहीं सम्मान और आदर उन्हें इनसे कभी मिलता.।

खुशी इनकी इन्हें देकर बडप्पन खुद निभाते हैं,
वही ताउम्र  छोटों  से  उचित  सम्मान पाते हैं .।

दिल से दिल मिल जाएंं जो वो घर आबाद रहता है,
गुजरती है उम्र खुशियों में, प्यारा सा घर संसार रहता है....

बुधवार, 12 अप्रैल 2017

हम क्रांति के गीत गाते चलें



राष्ट्र की चेतना को जगाते चलें
हम क्रांति के गीत गाते चलें...

अंधेरे को टिकने न दें हम यहाँ,
नयी रोशनी हम जलाते चलें ।
निराशा न हो अब कहीं देश में,
आशा का सूरज उगाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...


जागे धरा और गगन भी जगे,
दिशा जाग जाए पवन भी जगे ।
नया तान छेड़े अब पंछी यहाँ,
नव क्रांति के स्वर उठाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...


अशिक्षित रहे न कोई देश में,
पराश्रित रहे न कोई देश में ।
समृद्धि दिखे अब हर क्षेत्र में,
स्वावलम्बी, सशक्त राष्ट्र बनाते चलें।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........


प्रदूषण हटाएंं पर्यावरण संवारें,
पुनः राष्ट्रभूमि में हरितिमा उगायें ।
सभ्य, सुशिक्षित बने देशवासी,
गरीबी ,उदासी मिटाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........


जगे नारियाँ शक्ति का बोध हो,
हो प्रगति, न कोई अवरोध हो ।
अब देश की अस्मिता जाए ,
शक्ति के गुण गुनगनाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें...........


युवा देश के आज संकल्प लें ,
नव निर्माण फिर से सृजन का करें
मानवी वेदना को मिटाते हुए,
धरा स्वर्ग सी अब बनाते चलें ।
हम क्रांति के गीत गाते चलें..........

बुधवार, 5 अप्रैल 2017

शुक्रिया प्रभु का.......






हम चलें एक कदम
फिर कदम दर कदम
यूँ कदम से कदम हम
फिर बढाते चले.......
जिन्दगी राह सी,और
चलना गर मंजिल.....
नयी उम्मीद मन में जगाते रहें.......
खुशियाँ मिले या गम
हम चले,हर कदम
शुकराने तेरे (प्रभु के) मन में गाते रहें......


डर भी है लाजिमी, इन राहों पर,
कहीं खाई है, तो कभी तूफान हैं......
कभी राही मिले जाने-अनजाने से,
कहीं राहें बहुत ही सुनसान हैं........
आशा उम्मीद के संग हो थोड़ा सब्र
साहस देना तो उसकी पहचान है......
मन मेंं हर पल करे जो
शुकराना तेरा(प्रभु का)....
मंजिलें पास लाना तेरा काम है.....
ये दुनिया तेरी, जिन्दगानी तेरी,
बस यूँ जीना सिखाना तेरा काम है.....


कभी चिलमिलाती उमस का कहर,
कभी शीत जीवन सिकुडाती सी है.....
कभी रात काली अमावश बनी,
कभी चाँद पूनम दे जाती जो है....
न हो कोई शिकवा ,न कोई गिला
बस तेरे गुण ही यूँ गुनगुनाते रहें,
जीवन दर्शन जो दिया तूने,
शुकराने तेरे मन में गाते रहें........
नयी उम्मीद मन में जगाते रहें....

मंगलवार, 28 मार्च 2017

उफ! "गर्मी आ गयी"

     



बसंत की मेजबानी अभी चल ही रही थी,
तभी दरवाजे पर दस्तक दे गर्मी बोली .....
               "लो मैंं आ गई"

औऱ फिर सब एक साथ बोल उठे....
           उफ !गर्मी आ गई ?

हाँ !  मैं आ गयी......अब क्या हुआ?
सखी सर्दी  जब थी यहाँ आई,
तब भी तुम कहाँ खुश थे ?
रोज स्मरण कर मुझे
कोसे थे सर्दी को तुम........
ताने -बाने सर्दी सुनकर
चुप लौटी बेचारी बनकर।
उसे मिटाने और निबटाने,
क्या-क्या नहीं करे थे तुम........
पेड़ भी सारे काट गिराये,
बस तब तुमको धूप ही भाये ?
छाँव कहीं पर रह ना जाए,
राहों के भी वृक्ष कटाये.......
जगह-जगह अलाव जलाकर,
फिर सर्दी को तुम निबटाये.......
गयी बेचारी अपमानित सी होकर,
बसंत आ गया फिर मुँह धोकर
दो दिन की मेहमानवाजी
फिर तुम सबको भा गयी
पर अब  लो "मैं आ गयी"......
करो जतन मुझसे निबटो तुम,
मैं हर घर -आँगन में छा गयी....
      "लो मैं आ गयी"
-सुधा देवरानी






बुधवार, 22 मार्च 2017

जब से मिले हो तुम


जीवन  बदला ,दुनिया बदली,
मन को अनोखा,ज्ञान मिला।
मिलकर तुमसे मुझको मुझमें
 एक नया इंसान मिला।

रोके भी नहीं रुकती थी जो,
आज चलाए चलती हूँ।
जो तुम चाहते वही हूँ करती
जैसे कोई कठपुतली हूँ

माथे की तुम्हारी एक शिकन,
मन ऐसा झकझोरे क्यों...
होंठों की तुम्हारी एक हँसी
मानूँ जीवन की बडी खुशी

गलती भी तुम्हारी सिर्फ़ शरारत,
दुख अपना गर तुम्हें मुसीबत ।
दुनिया अपनी उजड सी जाती,
आँखों में दिखे गर थोड़ी नफरत ।

बेवशी सी कैसी छायी मुझमें
क्यों हर सुख-दुख देखूँ तुममें.....

कब चाहा ऐसे बन जाऊँँ,
जजबाती फिर कहलाऊँ।
प्रेम-दीवानी सी बनकर......
फिर विरह-व्यथा में पछताऊँ ।

गुरुवार, 9 मार्च 2017

दो दिन की हमदर्दी में, जीवन किसका निभ पाया....


जाने इनके जीवन में ,
ये कैसा मोड आया,
खुशियाँँ कोसों दूर गयी
दुख का सागर गहराया...
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया.....

आयी है बसंत मौसम में,
हरियाली है हर मन में,
पतझड़ है तो बस इनके,
इस सूने से जीवन में.......
इस सूने जीवन में तो क्या,
खुशियाँ आना मुमकिन है ?
आँसू अविरल बहते इनके ,
मन मेरा ऐसे घबराया......

छिन गया बचपन बच्चों का,
उठ गया सर से जब साया,
हो गये अनाथ जो इक पल में
नहीं रहा पिता का इन्हे सहारा.....
मुश्किल जीवन बीहड राहें,
उस पर मासूम अकेले से,
कैसे आगे बढ़ पायेंगे,
मेरा मन सोचे घबराया.....

बूढे़ माँ-बाप आँखें फैलाकर,
जिसकी राह निहारा करते थे।
उसे "शहीद "कह विदा कर रहे,
स्वयं विदा जिससे लेने वाले थे...
इन बूढ़ीआँखों के बहते जो,
आँसू कौन पोंछने आयेगा.......
"गर्व करे शहीदों पर"पूरा देश।
घरवालों को कौन संभालेगा.....
दो दिन की हमदर्दी में,
जीवन किसका निभ पाया....
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया...

जाने इनके जीवन में,
एक ऐसा ही मोड़ आया
खुशियाँ कोसों दूर गयी...
दुख का सागर गहराया ।।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

"पुष्प और भ्रमर"





तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।

हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे...।.
बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा
तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई......
ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा ।

न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी.......
मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा
तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा....
और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा

तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी.....
मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।

           "मगर अफसोस" !!!

तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी......
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ?
मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ.....                      
ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा ।

मौसम में जब भी समाँ लौट आये.....
मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा .........


*कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा*
   

                                                      ...सुधा देवरानी*







                                                   

             




रविवार, 12 फ़रवरी 2017

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;



जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे,
कलई / पालिस कर चमका दिये गये
नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम...
ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है।
खोखले थे सो टूटना ही था,
दोष लाने वालों पर मढ दिये गये...
शुभ और अशुभ भी हो गयी घडियाँ....
मनहूसियत को बहुओं के सर मढते देखा है।
हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है।

झगड़ते थे बचपन मे भी,
खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के....
क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा,
हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का....
उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है।

वो बचपन था अब बडे हुए,
तब प्यार था अब नफरत है.....
छीनने के लिए खिलौने थे,
औऱ अब पैतृक सम्पत्ति.....
तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे,
अब वकील औऱ न्यायाधीश....
भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ;
या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

हो गयी जीत मिल गये हिस्से,
खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से...
जश्न मनाते सारे चमचे,
नाचते-गाते नये-नये रिश्ते...
अंधियारे -सूने कोने में छुप उसको सुबकते देखा है ;
या यूँ कह दे-"प्रेम के आगे दंभ को झुकते देखा है",
हाँ!मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

पर क्या फायदा ? पहल करेगा कौन,
जब बडा बडा ही बनकर बैठा,
छोटा भी छुटपन में ऐंठा.....
पडौसी रिश्ते तमाशबीन हुए,
माँ-बाप परलोक जो गये.......
कौन सुलह करवाए इनकी,
झूठी शान खोखला अभिमान...
अक्ल पर भी तो जाने कब से बडा सा पत्थर फेरा है ;
ऐसे में भी कभी किसी ने रिश्तों को निभते देखा है ?
हाँ !मैने ऐसे ही रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।
                                                         
                                           ....सुधा देवरानी

बुधवार, 25 जनवरी 2017

बेरोजगारी : "एक अभिशाप"


   नवयुवा अपने देश के,
    पढे-लिखे ,डिग्रीधारी
    सक्षम,समृद्ध, सुशिक्षित
     झेल रहे बेरोजगारी।
                               कर्ज ले,प्राप्त की उच्च शिक्षा,
                                अब सेठजी के ताने सुनते।
                               परेशान ये मानसिक तनाव से,
                                आत्महत्या के रास्ते ढूँढते।
      माँ,बहनों के दु:ख जो सह न सके,
      वे अभागे गरीबी मिटाने के वास्ते,
      परचून की दुकान पर मिर्ची तोल रहे।
      तो कुछ सैल्समैन बन गली-गली डोल  रहे।
                                        कुछ प्रशिक्षित नव-युवा,
                                        आन्दोलन कर रहे धरने पर बैठे,
                                        नारेबाजी के तुक्के भिडाते,
                                          मंत्री जी की राह देखते,
                                           नौकरी की गुहार लगाते।
      तो कुछ विदेशी कम्पनियों की सदस्यता
       में धन-जन जुटाने के जुगाड़ लगाते
          "हमारे सुशिक्षित नवयुवक,"
         " निठल्ले ,निकम्मे कहलाते"।
 बेरोजगारी इनके लिये अभिशाप नहीं तो और क्या है।
    अपने देश का ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है !!!
                                                           (सुधा देवरानी)
                                   

सोमवार, 9 जनवरी 2017

नारी-"अबला नहीं"



आभूषण रूपी बेड़ियाँ पहनकर...
अपमान, प्रताड़ना का दण्ड,
सहना नियति मान लिया...
अबला बनकर निर्भर रहकर,
जीना है यह जान लिया....
सदियों से हो रहा ये शोषण,
अब विनाश तक पहुँच गया ।
"नर-पिशाच" का फैला तोरण,
पूरे समाज तक पहुँच गया ।।


अब वक्त आ गया वर्चस्व करने का......
अन्धविश्वाश ,रूढिवादिता ,कुप्रथाओं,
से हो रहे विनाश को हरने का...
हाँ ! वक्त आ गया अब पुन: 
शक्ति रूप धारण करने का......


त्याग दो ये "बेड़ियाँ" तुम,
"लौहतन" अपना बना दो !
थरथराये अब ये दानव...
शक्तियां अपनी जगा दो !!!
लो हिसाब हर शोषण का...
उखाड़ फेंको अब ये तोरण !
याद आ जाए सभी को..
रानी लक्ष्मीबाई का युद्ध-भीषण ।


उठो नारी ! "आत्मजाग्रति" लाकर,
"आत्मशक्तियाँ" तुम बढ़ाओ !
"आत्मरक्षक" स्वयं बनकर ....
"निर्भय" निज जीवन बनाओ !!
शक्ति अपनी तुम जगाओ !!!
         .                   - सुधा देवरानी