रविवार, 21 मई 2017

नारी ! अब तेरे कर्तव्य और बढ़ गये.....




बढ़ रही दरिन्दगी समाज में,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ गये .......
माँ है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य औऱ बढ गये".......

संस्कृति, संस्कार  रोप बाग में ,
माली तेरे बाग यूँ उजड गये ........
दया,क्षमा की गन्ध आज है कहाँ ?
फूल में सुगन्ध आज है कहाँ ?
ममत्व,प्रेम है कहाँँ तू दे रही ?
पशु समान पुत्र बन गये .....
नारी ! तू ही पशुता का नाश कर,
समष्ट सृष्टि का नया विकास कर ।
"नारी ! तेरे फर्ज और बढ़गये".......
"अब तेरे कर्तव्य और बढ़ गये" .......

मशीनरी विकास आज हो रहा ,
मनुष्यता का ह्रास आज हो रहा ।
धर्म-कर्म भी नहीं रहे यहाँ ,
अन्धभक्ति ही पनप रही यहाँ ।
वृद्ध आज आश्रमों  में रो रहे ,
घर गिरे मकान आज हो रहे......
सेवा औऱ सम्मान अब रहा कहाँ ?
घमंड और अपमान ही बचा यहाँ ।
संस्कृति विलुप्त आज हो रही ..........
"माँ भारती" भी रुग्ण हो के रो रही ...

"माँ भारती" की है यही पुकार अब ,
"बचा सके तो तू बचा संस्कार अब"।
अनेकता में एकता बनी रहे ..........
बन्धुत्व की अमर कथा बनी रहे ।
अनेक धर्म लक्ष्य सबके एक हों ,
सम्मान की प्राची प्रथा बनी रहे .........
"सत्यता का मार्ग अब दिखा उन्हें",
"शिष्टता , सहिष्णुता सिखा उन्हे" ।
सभ्यता का बीज रोप बाग में ........
उम्मीद सभी नारी से ही कर रहे.......

दरिन्दगी मिटा तू ही समाज से,
नारी ! तेरे फर्ज और बढ़ रहे ......
माँ  है तू सृजन है तेरे हाथ में,
"अब तेरे कर्तव्य और बढ़ गये" ........


                  चित्र गूगल से साभार.....







एक टिप्पणी भेजें