शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

सियासत और दूरदर्शिता.....


                                                           

प्रभु श्री राम के रीछ-वानर हों या,
श्री कृष्ण जी के ग्वाल - बाल...

महात्मा बुद्ध के परिव्राजक हों या,
महात्मा गाँधी जी के  सत्याग्रही.....

दूरदर्शी थे समय के पारखी थे,
समय की गरिमा को पहचाने थे.....

अपनी भूमिका को निखारकर
जीवन अपना संवारे थे......

आजकल भी कुछ नेता बड़े दूरदर्शी हो गये,
देखो ! कैसे दल-बदल मोदी -लहर में बह गये.....

इसी को कहते हैं चलती का नाम गाड़ी,
गर चल दिया तो हुआ सयाना......
...................छूट गया तो हुआ अनाड़ी....

नीतीश जी को ही देखिये, कैसे गठबंधन छोड़ बैठे !
व्यामोह के चक्रव्यूह से, कुशलता से निकल बैठे !....

दूरदर्शिता के परिचायक नीतीश जी.......
 राजनीति के असली दाँव पेंच चल बैठे......

भाजपा का दामन पकड़ अनेक नेता सफल हो गये
दल - बदलू बनकर ये सियासत के रंग में रंग लिये.........।

बहुत बड़ी बात है,देशवासियों का विश्वासमत हासिल करना !
उससे भी बड़ी बात है विश्वास पर खरा उतरना.....
आगे - आगे देखते हैं भाजपा करती है क्या....?
 सभी के विश्वास पर खरी भी उतरती है क्या............???
                                                                                                चित्र साभार गूगल से.....

बुधवार, 2 अगस्त 2017

*कुदरत की मार*



देखो ! अब का मनभावन सावन,
 कैसे  अस्त-व्यस्त  है जीवन !
कहीं पड़ रही उमस भरी गर्मी, 
कहींं मौसम की ज्यादा ही नर्मी.....

कहीं भरा है पानी - पानी,
कहीं बाढ़ देख हुई हैरानी !
कहीं घर में भर आया पानी ,
घर छोड़ी फिर मुनिया रानी.......

भीगी सारी किताबें उसकी,
भीग  गया  जब  बस्ता...
कैम्पस में दिन काट रहे,
खाने को मिले न खस्ता....

घर पर बछिया छोटी सी
बाँधी थी वह  खूँटी  से...
वहीं बंधी गौरा(गाय) प्यारी....
दूध निकाले थी महतारी

कैसी होगी बछिया बेचारी,
क्या सोची होगी गौरा प्यारी....?
छोड़ा उनको खुद आ भागे !!
उन सबका वहाँ कौन है आगे...?

सूखी थी जब नदी गर्मी में
तब कचड़ा फैंके थे नदी में....?
रास्ता जब नदी का रोका......
पानी ने घर आकर टोका !

मौसम को बुरा कहते अब सब,
सावन को "निरा" कहते हैंं सब ।
मत भूलो अपनी ही करनी है ,
फिर ये सब खुद ही तो भरनी है......

राजस्थान हुआ बाढ़ से बेहाल,
गुजरात  का भी है  बुरा हाल....
पहाड़ों पर हो रहा भूस्खलन.....
कहीं बादल फटने का है चलन ।

"विज्ञान" खड़ा मुँह ताक रहा !
"प्रगति" भी सिर धुनकर रोती है !
कुदरत "विध्वंस" पर आयी है
"बोलो अब करोगे क्या ???
ललकार के हमसे कहती है......

देख ली पर्यावरण की विनाश-लीला !!
सम्भल सकें तो सम्भलना है.......
अब "पर्यावरण - सुरक्षा"  का...
हर मानव को व्रत करना है ......
                                                 चित्र गूगल से साभार.....