सोमवार, 2 अक्तूबर 2017

तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी.......






सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
रो-रो कर सहती प्रताड़ना को
नियति मानती थी....
जैसे कीलों के आसन पर ,
कोई कुत्ता पल पल रोता....
जब चुभती कीलें उठ जाता
फिर थककर सोता......
फिर बैठ वहीं, दुखकर
बस थोड़ा उठ जाता....
पर कभी ना कोशिश करता
आसन से बाहर आने की ,
अपने भारत की भी कुछ,ऐसे ही कहानी थी...
तब सोई थी जनता, स्वीकार गुलामी थी.....
गर रोष में आकर कोई 
आवाज उठा देता......
दुश्मन से फिर अपना
सर्वस्व लुटा देता......
इस डर से चुप सहना ही सबने ठानी थी....
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी...
बड़ी कोशिश से बापू ने
सोयों को जगाया था........
आजादी का सपना 
फिर सबको दिखाया था.......
अंग्रेज चले जायेंं ,
फिर देश सम्भालेंगे.........
घर के लफड़े जो हैं ,
हम मिलकर निबटा लेंगे.......
मन में भावना ऐसी, बापू ने ठानी थी....
जब सोयी थी जनता, स्वीकार गुलामी थी....
दुश्मन तो हार गया !
अपनो ने हरा डाला....
आजाद किया जिस देश को
टुकड़े में बदल डाला.......
विरोधी तत्वों की मिली भगत पुरानी थी......
तब सोयी थी जनता स्वीकार गुलामी थी.....
भला किया जिनका....
अपमान मिला उनसे
सीधे सच्चे बापू...
धोखे मिले अपनो से.......
अब भी ना जाने क्या जनता ने ठानी थी.....
तब सोयी थी जनता स्वीकार गुलामी थी....
काफी था बापू जो
कर चुके थे तब तक तो
सरकार ने सत्ता में सियासत जो निभानी थी...
तब सोई थी जनता स्वीकार गुलामी थी....
जो होना था सो हो गया,
बापू के हिस्से दोष गया....
आजादी के बदले में बदनामी
अहिंसा के बदले में, हत्या.....
बचा-खुचा जो मान है जनता आज  मिटाती है
जन्म-दिवस पर उनकी जयन्ती ऐसे मनाती है ?..
आलोचक उनकी करनी में
पानी फेरे जाते हैं.......
जो खुद कुछ कर न सके
बापू को मिटाते हैं.......
इतिहास बन गये जो ,उनको इतिहास ही रहने दो......
परकर्मों को कहते कहते,निज कर्म ही मत भूलो.....
"आज"तो तुम हो देश के, तुम ही कुछ आज करो....



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